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आप का मेरे खरपतवारी “मनोभूमि” पर स्वागत है. :) बहुत मेहनत से इस भूमि को उपजाऊ बनाया है लेकिन कभी कभी इस पर समय नामक शैतान नमक छिड़क जाता है. समय की देखादेखी मौसम भी आँख तरेरने लगता है. तेज धूप में जब फसलें सूखने को होती है तो कोई आप जैसा इसे सींचने चला आता है और यह एहसास दिला जाता है कि मेरी मनोभूमि कभी बंजर नही हो सकती.

कुछ न कुछ लिखते रहने की सिर्फ एक ही वजह होती है, मन के इस विशाल मैदान पर विचारों का सर्पीला प्रवाह…. और एक नदी का जन्म होता है जिनकी सहायक नदियाँ आप के विचार होते हैं जिनके बिना नदी का आगे बढ़ पाना असम्भव है.

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IIT Kharagpur में भोजन

अब से थोड़ी देर पहले भोजन करने वाली मेज पर बैठा भोजन चबा रहा था. खाने में सिर्फ एक किस्म की करेले की सब्जी और आलू-प्याज-नमक-मिर्च मिक्स एक बड़ा सा गोला था. रोटियाँ भी थी जिसमें आटा जिद करके रोटियों से लिपटा हुआ था. फिलहाल मैंने बस इतना ही लिया. लेकिन आइटम ढेर सारे थे, जो कि मेरे काम के नहीं थे.

रोटियाँ जरा सख्त थी सो मैं उन्हें चबा रहा था लेकिन मैंने देखा कि कुछ लोग दाल के साथ चावल भी चबा रहे थे, लगभग उसी अन्दाज में… मैंने अनुमान लगाया कि शायद चावल और दाल भी उतने ही सख्त होंगे जिसके कारण उन लोगों को चबाना पड़ रहा है. साथ ही साथ भोजन करने की शैली इतनी लुभावनी थी जितनी लुभावनी शकीरा की कमर हुआ करती है. शैली में अद्भुत किस्म की तीव्रता थी, जिसे देखकर मेरे पसीने छूटने लगे कि इतनी तेजी से तो मैं भी नहीं खा सकता.. उसी वक्त ख्याल आया कि मैं IIT में हूँ और यहाँ के बच्चों से तेज कोई नहीं होता. हर मामले में….

भोजन के उपरान्त मैंने अपनी थाली उठाई, जिसमें कुछ शेष न था सिवाय अधपकी रोटियों के कुछ टुकड़ों के… लेकिन अन्य थालियाँ जूठन के भार को सहन करती दिखी.

अन्न की इतनी बरबादी मैंने पहले भी देखी थी लेकिन उन्हें गाँव के कुत्ते खा जाते थे लेकिन यहाँ तो कुत्ते उतनी मात्रा में दिखे नहीं जितनी मात्रा में बिल्लियाँ नजर आई थी, जो कि रोटी के टुकड़े नहीं खाती बल्कि वे तो मछलियों की दीवानी हैं.

इतना सब देखने के बाद मैंने अपने आप से कुछ पूछा और ढेर सारे उत्तर मिलने लगे. हाँलाकि वे उत्तर IIT Kharagpur से नहीं जुड़े हैं, बल्कि हर उस संस्थान से जुड़े हैं जहाँ खाने की ऐसी बरबादी होती है.

भोजन से आप भी पूछ कर देखिए. वह खुद बोलना शुरू कर देगा कि कैसे मात्र दूध से जीवित रहने वाला एक छोटा सा बच्चा धीरे धीरे दाल के जूस और चावल के मांड से होते हुए हड्डियाँ चबाना शुरू कर देता है.

भोजन ने अपना इतिहास बताना शुरू किया था कि एक ऐसी सभ्यता आई थी जिसने उसकी पूजा करनी शुरू की थी. भोजन बनाने से पहले और भोजन करने से पहले उसकी पूजा होती थी. जिस स्थान पर उसे बनाया जाता था उसे हर रोज पवित्र किया जाता था.

भोजन को ईश्वर तुल्य समझना एक मनोविज्ञान हुआ करता था. ईश्वर के प्रति आस्था के चलते भोजन बनाने वाला पूरे मन से स्वादिष्ट भोजन बनाया करता था, क्योंकि उसके बनाये गये भोजन की पूजा होती है और भोजन करने वाला जब उसके द्वारा बनाये गये भोजन की प्रशंसा करता है तो एक अद्भुत किस्म की खुशी मिलती है. जिससे भोजन को और भी स्वादिष्ट बनाने की प्रेरणा मिलती थी. यही कारण था कि उस सभ्यता में भोजन की ढेरों किस्में पाई जाती है. जिसमें तरह तरह के नायाब किस्म के स्वाद हुआ करते थे.

हर रोज अलग अलग किस्म के स्वाद चखने के कारण उसे पूरी तरह से आत्मसात करके खाया जाता था. ताकि स्वाद का भरपूर मजा ले सके. क्योंकि भोजन में अत्यधिक वेराइटी होने के कारण वह स्वाद महीनों बाद मिलने की संभावना भी होती थी. धीरे धीरे खाने से भोजन का समुचित पाचन भी हो जाया करता था.

चूँकि भोजन की पूजा होती थी तो भोजन फेंकना पाप समझा जाता था और सिर्फ जरूरत के हिसाब से ही भोजन लिया जाता था.

कुछ देर बाद वर्तमान में लौटते हुए भोजन ने बताया कि अब तो मेरा व्यवसाय हो गया है. न तो मेरी पूजा होती है और न ही मेरे प्रति किसी के पास संवेदना है. सभी के पास अब धन आ गया है, वे उस धन की बदौलत मुझे खरीद सकते हैं… और मुझे बेचने वाले मेरे द्वारा ज्यादा से ज्यादा धन कमाने का जरिया अक्सर खोजते रहते हैं. उन्हें सफाई और स्वाद पर अनुसंधान की कोई फिक्र नहीं है. वे बस खाने वाले से पैसे लेते हैं और अगर मैं बच गया तो मुझे कूड़ेदान में फेंक आते हैं. न जाने किस माँ बाप ने उन्हें पाला है… और वह शिकायती लहजे के साथ ही भावुक भी हो गया.

मैंने उसे समझाया. दिल छोटा नहीं करते. तुम्हारे साथ ज्यादा दिनों तक अन्याय नहीं होगा. तुम खाने वालों को समझते ही नहीं.. सिर्फ उन्हें दोष दे रहे हो. आखिर वे तुम्हें क्यों न फेंके? तुम्हारे अन्दर न स्वाद रहा न ही किसी के पास इतनी फुर्सत है कि वे तुम्हें सजाने सँवारने में लगे रहें. पहले का जमाना चला गया प्यारे!! अब तो वो माँएं भी नहीं रही जो अपने बच्चों के लिए सुबह से शाम तक पाकशाला में लगी रहती थी. वे बहुत बड़ी रसायनज्ञ हुआ करती थी, लेकिन अब उन्हें यह पदवी अच्छी नहीं लगती उन्हें घर में बैठकर औषधियों के साथ खिलवाड़ करना अच्छा नहीं लगता. वे अब जागरूक हो गयी हैं और घर चलाने के लिए घर से बाहर मेहनत करती हैं.

अरे! तुम्हें तो पता ही होगा कि भारत अब गरीब देश हो गया है न!! एक मर्द की कमाई से पूरे घर का खर्च नहीं चल पाता तो औरतों को भी काम करना पड़ता है.

भोजन ने आँखें तरेर कर पूछा – कैसा खर्च? मैंने बोला – डाक्टर का खर्च, पढ़ाई का खर्च, बिजली का खर्च, पानी का खर्च, राशन का खर्च, वीकएंड का खर्च, पेट्रोल का खर्च.. आखिर कितने खर्च गिनाऊँ?

– बाप रे!! इतना सारा खर्च?? तभी तो मैं किसी के पेट में हजम नहीं होता.

एकाएक उसने अपना रूख बदला और एक धमकी भरे शब्दों में बोला – मुझे चाहे जितना भी सड़ाओ, चाहे बिना भूख के खाकर, अपने पेट में.. या फिर फेंककर, किसी नाली में….

एक दिन ऐसा आयेगा जब तुम्हें भूख नहीं लगेगी……

उसे मैंने टोका – काहे नहीं भूख लगेगी? इन्सान तो जन्म जन्म से भूखा है. भोजन ने उत्तर दिया – अरे मूरख!! जलती हुई आग में ढेर सारी सूखी पत्तियाँ भी फेंको तो वह बुझ जाती है.. लेकिन इन्सान तो बिना आग के ही हरी पत्तियाँ जलाने की कोशिश करता है और बाद में कहता है कि उसे कब्ज है.. फिर कायमचूर्ण खाने लगता है… समय बीतने के साथ उसे भूख लगना बन्द हो जाती है..

- अच्छा तभी भूख लगने वाली गोलियाँ बाजार में बिकती हैं.

हाँ इन्सान तो रसायनशास्त्र का ज्ञाता हो चुका है.. मुझसे क्या पूछते हो? और वह मुँह फुलाकर एकाएक अदृश्य हो गया. क्योंकि हमारे कुछ दोस्तों ने टोका था – क्या सोच रहे हो मनीष!!? (दीपू और नरेन्द्र आपस में कुछ बातें करते हुए साथ चल रहे थे.)

मैं IIT Kharagpur की सेन्ट्रल लाइब्रेरी तक पहुँच आया था और वातानुकूलित कक्ष में जाने लगा. सामने से एक लड़की आ रही थी, जिसे पढ़ने का बेहद शौक है.. इन छुट्टियों में भी वह मोर्चा सम्भाले हुए है. हर रोज सुबह से शाम तक नीली कुर्सियाँ तोड़ा करती है. दिमाग को ठंडा करने हेतु A.C. से सट कर बैठती है. इतनी मेहनत करने वाले छात्रों के लिए बेहतरीन भोजन न मिले तो आखिर इनका दिमाग तेजी से कैसे चलेगा. इस समय उस पर सीधी नजर पड़ रही है, पढ़ते पढ़ते वह एक तरफ सिर झुकाकर सो भी जाती है. या फिर ऐसा भी हो सकता है कि रट्टा लगाती हो.. आँख बन्द करके..

कुछ अन्य स्टूडेंट भी लगे हुए हैं.. जिनमें से कुछ सो रहे हैं.. किताब सामने पड़ी हुई है.. और कुछ यूट्यूब खोलकर मन हल्का कर रहे हैं.. और मैं यहाँ बैठा भोजन से जुड़े तथ्य और उसके असर का सीधा प्रसारण कर रहा हूँ.. :) लेकिन यह जरूरी नहीं कि जितने यहाँ सो रहे हैं उन्हें भोजन के कारण नींद आ रही है.. अरे भई!! दुनिया में नींद आने के कई कारण होते हैं.. बच्चे इतना पढ़ते हैं कि दिमाग गरम हो जाता है और पूरा सिस्टम hibernate mode में चला जाता है.. फिर जैसे ही खोपड़ी का प्रोसेसर ठंडा हुआ, वैसे ही आँख खुल जाती है.. पुरानी शब्दावली में इसे “श्वान-निद्रा” भी कहते हैं.. विद्यार्थियों का एक मुख्य लक्षण..  :D

- मनीष

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