कुछ न कुछ लिखते रहने की सिर्फ एक ही वजह होती है, मन के इस विशाल मैदान पर विचारों का सर्पीला प्रवाह…. और एक नदी का जन्म होता है जिनकी सहायक नदियाँ आप के विचार होते हैं जिनके बिना नदी का आगे बढ़ पाना असम्भव है.
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जँतसार (कहानी)
अंधेरे में ढिबरी की लौ एक लय में इधर उधर नाच रही थी और उसी लय में मंगली की जेठानी और ननद एक श्रम गीत गा रही थी. मंगली चुपचाप जाँते के हत्थे को एक हाथ से और कभी दूसरे … Continue reading
‘अछूत’
आसमान पर कुछ सफ़ेद बादल धीमी गति से तैर रहे थे। धीमी हवा कभी कभी मेरे बालों को उड़ा देती। सूरज एक बादल की आड़ मे छिपा बैठा था और उस उड़ते बादल की छाया धीरे धीरे मुझसे दूर टीले … Continue reading
प्रेम : “आओ जी”
काफी दिनों से राजनीतिक और समसामायिक घटनाओं पर चिन्तन और भड़ास निकालने के चलते अपने प्रिय टॉपिक से भटक गया था लेकिन कुछ जागरूक दोस्तों ने पुनः इस फील्ड में कुछ लिखने को प्रेरित किया. वैसे भी चिन्तन उस विषय … Continue reading
कल्पनाशीलता
मनुष्य और मनुष्यता की बकइती बहुत पुरानी है, फिर भी मनुष्य बकइती से बाज़ नही आता. वह अपनी बकइती से मनुष्यता की एक मौलिक “डेफिनीशन” हर किसी को देता फिरता है. इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज हम भी … Continue reading
स्पंदन
कभी वह भी दौर हुआ करता था जब ट्रेन छुक-छुक छुक-छुक चला करती थी और सुरमई सीटी बजाया करती थी, लेकिन इस ट्रेन से सिर्फ सांय सांय की आवाज आ रही थी जैसे हवा गुनगुनाना छोड़ कर कहीं भागी जा … Continue reading
सृजन
कल की शाम छोटे छोटे टुकड़ो में बिखरे सिन्दूरी रंग के बादलों को देखकर गुजार रहा था, साथ ही डूबते सूरज की आकर्षक छवियों के साथ मैं भी कहीं डूब रहा था…… अपनी यादों के आकाशीय क्षितिज पर…… मन कितना … Continue reading
परिवर्तन
दोपहर का समय, दूर कहीं से ट्यूबवेल के इंजन चलने की आवाज आ रही थी। सिंचाई के लिए बनाई गयी कच्ची नाली में बहते हुए पानी के आगे आगे एक छोटा बच्चा भाग रहा था… थोड़ी देर पहले पानी इस … Continue reading
इंद्रधनुष
अपनी सुनहरी किरणों के साथ सूरज डूब रहा था, आसमान पर छाये काले बादलों की दुनिया भी रंगीन हो चली थी… थोड़ी देर पहले बारिश हुई थी… …और वह मैदान की हरी घासों पर दौड़ता हुआ उस तालाब के किनारे … Continue reading
2 जुलाई, 2010
सुबह 10 बजे लकी का फोन आया। न हाय, न हैलो… सीधे एक प्रश्न दाग दिया। “तेरे बाप घर पे हैं?” “क्यों भाई!! उनसे कोई काम है…?” “मुझे किसी पागल कुत्ते ने काटा है क्या? जो तेरे बाप के … Continue reading
मस्ती की पाठशाला
( अनुरोध : ज़रा लम्बा लिख मारा है, आपको यहाँ समय देने की कोई ज़रूरत नहीं है, यह बकवास उनके लिये है जो 12वीं तक गणित के छात्र रहे हैं…… मुझे लगता है कि 12वीं की मैथ पढ़े बिना आपको … Continue reading
इंतज़ार
ढलती शाम सड़क पर छितराये सूखे पीले पत्तो की चरमराती आवाज से वह चौंकता है उस वीरान मन्दिर की टूटी सीढ़ियों के पत्थरों के चटकने से वह घबराता है सहमा सा वह निहारता है उस सूनी राह को … Continue reading
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एक झलक बचपन की
गर्मी के दिन, स्कूल की छुट्टियाँ और नानी जी का घर. सवेरे सवेरे उत्पात शुरू हो जाता था खरबूजे को लेकर.. हमें हमेशा पूरा ही चाहिये होता था… और चावल का मांड विद हल्का सा नमक.. चूल्हे की धीमी आँच में भुने आलू का चोखा और धनिया की चटनी… रोटी को तवे पर कड़क करने की जिद… और अन्ततः दाल चावल का लड्डू बनाकर भोजन जबरन खत्म करना.
भर पेट खा लेने के बाद बागीचे के पेड़ों पर धमाचौकड़ी. कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल पर.. नीचे से नानी जी चिल्लाती रहती – नीचे उतर बदमाश!! गिरकर हड्डी पसली तोड़ेगा क्या? एकाध बार धम्म की आवाज़ आती.. कुछ अधपके से आम गिरते थे जिन्हें तोते के सगे सम्बन्धियों ने आधा खा लिया होता था.
दुपहरिया होते ही दूर फैला विशाल मैदान झिलमिलाने लगता और नीचे से नानी जी तिलमिलाने लगती.
“उतर नीचे!! जब देखो तब चढ़ा रहता है. वनमानुष कहीं का!!”
बागीचे के पास ही नल था. बाल्टी-लोटा लेकर नहाने बैठ जाते.. लोटे में पानी भरकर उसे उल्टा सिर पर टिका लेते.. शीतल सा पानी धीरे धीरे रिसता रहता.. और हम दूर क्षितिज के धुंधलके में आँखें गड़ाये रहते.. सिर्फ तब तक.. जब तक कि अगला सायरन नहीं बज उठता – “अरे अभी तक बैठा है!!”
खाने के बाद किसी घनी छाँव वाले पेड़ के नीचे अपना खटोला रखकर लेट जाते.. आम के पत्तियों की फिरकी बनाकर.. बहती हवा के साथ वह तेजी से नाचती रहती.. और हम कब सो जाते पता ही नहीं चलता. नींद टूटती अगले सायरन की आवाज पर..
“गुड़ का रस पीना हो तो जल्दी आओ.. भुने हुए नमकीन दाने भी हैं.” जिसे सुनकर एक आँख मूँदे दालान की तरफ भागते.
शाम जब सुनहरी हो जाती तब खेतों की पगडंडियों से होते हुए तालाब तक जाते.. वहाँ मछलियाँ रहती थी और एक बड़ा सा बरगद का पेड़ भी..
रात में लालटेन की रोशनी और आँगन में पक रही सब्जी की सोंधी सी खुशबू.. और वह बिना चीनी का जबरन पिलाया गया दूध.
और फिर नानी के घुटनों पर झूलना.. और उनकी कहानियाँ सुनना.. कहानियाँ चलती रहती.. जुगनू आस पास मँडराते रहते.. तारों के बीच से गुजरता कोई जहाज.. लाल हरी बत्तियाँ जलाता हुआ..
..और भारी होती पलकें…
कुछ गीत उन पलों को दोहराते हैं -
आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ एक ऐसे गगन के तले.. जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो, बस प्यार ही प्यार पले.. एक ऐसे गगन के तले..
सूरज की पहली किरण से, आशा का सवेरा जागे.. चंदा की किरण से धुल कर, घनघोर अंधेरा भागे..
कभी धूप खिले कभी छाँव मिले.. लम्बी सी डगर न खले.. जहाँ ग़म भी न हो.. आँसू भी न हो, बस प्यार ही प्यार पले.. एक ऐसे गगन के तले..
जहाँ दूर नज़र दौड़ाएं, आज़ाद गगन लहराए.. जहाँ रंग बिरंगे पंछी, आशा का संदेसा लाएं..
सपनो मे पली, हँसती हो कली… जहाँ शाम सुहानी ढले.. जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो, बस प्यार ही प्यार पले.. एक ऐसे गगन के तले..