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कुछ न कुछ लिखते रहने की सिर्फ एक ही वजह होती है, मन के इस विशाल मैदान पर विचारों का सर्पीला प्रवाह…. और एक नदी का जन्म होता है जिनकी सहायक नदियाँ आप के विचार होते हैं जिनके बिना नदी का आगे बढ़ पाना असम्भव है.

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एक झलक बचपन की

गर्मी के दिन, स्कूल की छुट्टियाँ और नानी जी का घर. सवेरे सवेरे उत्पात शुरू हो जाता था खरबूजे को लेकर.. हमें हमेशा पूरा ही चाहिये होता था… और चावल का मांड विद हल्का सा नमक.. चूल्हे की धीमी आँच में भुने आलू का चोखा और धनिया की चटनी… रोटी को तवे पर कड़क करने की जिद… और अन्ततः दाल चावल का लड्डू बनाकर भोजन जबरन खत्म करना.

भर पेट खा लेने के बाद बागीचे के पेड़ों पर धमाचौकड़ी. कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल पर.. नीचे से नानी जी चिल्लाती रहती – नीचे उतर बदमाश!! गिरकर हड्डी पसली तोड़ेगा क्या? एकाध बार धम्म की आवाज़ आती.. कुछ अधपके से आम गिरते थे जिन्हें तोते के सगे सम्बन्धियों ने आधा खा लिया होता था.

दुपहरिया होते ही दूर फैला विशाल मैदान झिलमिलाने लगता और नीचे से नानी जी तिलमिलाने लगती.

“उतर नीचे!! जब देखो तब चढ़ा रहता है. वनमानुष कहीं का!!”

बागीचे के पास ही नल था. बाल्टी-लोटा लेकर नहाने बैठ जाते.. लोटे में पानी भरकर उसे उल्टा सिर पर टिका लेते.. शीतल सा पानी धीरे धीरे रिसता रहता.. और हम दूर क्षितिज के धुंधलके में आँखें गड़ाये रहते.. सिर्फ तब तक.. जब तक कि अगला सायरन नहीं बज उठता – “अरे अभी तक बैठा है!!”

खाने के बाद किसी घनी छाँव वाले पेड़ के नीचे अपना खटोला रखकर लेट जाते.. आम के पत्तियों की फिरकी बनाकर.. बहती हवा के साथ वह तेजी से नाचती रहती.. और हम कब सो जाते पता ही नहीं चलता. नींद टूटती अगले सायरन की आवाज पर..

“गुड़ का रस पीना हो तो जल्दी आओ.. भुने हुए नमकीन दाने भी हैं.” जिसे सुनकर एक आँख मूँदे दालान की तरफ भागते.

शाम जब सुनहरी हो जाती तब खेतों की पगडंडियों से होते हुए तालाब तक जाते.. वहाँ मछलियाँ रहती थी और एक बड़ा सा बरगद का पेड़ भी..

रात में लालटेन की रोशनी और आँगन में पक रही सब्जी की सोंधी सी खुशबू.. और वह बिना चीनी का जबरन पिलाया गया दूध.

और फिर नानी के घुटनों पर झूलना.. और उनकी कहानियाँ सुनना.. कहानियाँ चलती रहती.. जुगनू आस पास मँडराते रहते.. तारों के बीच से गुजरता कोई जहाज.. लाल हरी बत्तियाँ जलाता हुआ..

..और भारी होती पलकें…

कुछ गीत उन पलों को दोहराते हैं -



आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ एक ऐसे गगन के तले.. जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो, बस प्यार ही प्यार पले.. एक ऐसे गगन के तले..

सूरज की पहली किरण से, आशा का सवेरा जागे.. चंदा की किरण से धुल कर, घनघोर अंधेरा भागे..

कभी धूप खिले कभी छाँव मिले.. लम्बी सी डगर न खले.. जहाँ ग़म भी न हो.. आँसू भी न हो, बस प्यार ही प्यार पले.. एक ऐसे गगन के तले..

जहाँ दूर नज़र दौड़ाएं, आज़ाद गगन लहराए.. जहाँ रंग बिरंगे पंछी, आशा का संदेसा लाएं..

सपनो मे पली, हँसती हो कली… जहाँ शाम सुहानी ढले.. जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो, बस प्यार ही प्यार पले.. एक ऐसे गगन के तले..

  1. शराब हँसती है Leave a reply