१
….वह उदास होकर उस छायादार वृक्ष के नीचे उग आई छोटी घासों को हल्के हाथों से नोचने लगी. हवा अपनी मन्द गति से बहती हुई उसके बालों को छेड़ती रहती और वह बार बार अपने चेहरे से बालों को हटाती. इसी बीच दूर जाते रास्ते से उतरकर वह सौदागर उसकी तरफ बढ़ चला.
“उदास हो?” पास आकर उसने पूछा.
वह दूसरी तरफ देखने लगी.
“उदास हो?” पास आकर उसने पूछा.
वह दूसरी तरफ देखने लगी. सौदागर अपने कंधे से थैले को उतारकर वृक्ष की उभरी हुई जड़ों के बीच बैठ गया. वह अब भी घासों को मरोड़कर अपनी उदासी मिटा रही थी.
“आपने कभी काले रंग का फूल देखा है?” सौदगर ने ऊँची आवाज में उससे पूछा.
वह चुप रही.
“ठीक है! मैं दिखाता हूँ… ये देखिए, काले रंग का फूल… अब यकीन हुआ?”
वह जिज्ञासा से भरी कनखियों से पीछे देखी. सौदागर एक सूख चुके गोबर के टुकड़े को लेकर सूँघ रहा था. वह खुल कर हँस पड़ी.
“आपके हाथों में जो चीज है वह दरअसल गोबर है.. सूखा हुआ..” इतना कहकर वह मुस्कुरा दी.
“छी छी” सौदागर ने तुरन्त उसे अपनी नाक से दूर किया और उस चीज के प्रति घिन्नाहट प्रकट करते हुए दूसरी तरफ फेंक दिया.
वह फिर से हँस पड़ी.
सौदागर अपने थैले में कुछ ढूँढते हुए बुदबुदाने लगा – “ना जाने कैसे… वह चीज मेरे थैले में आ गयी!?!”
“अच्छा !! कुछ और है दिखाने को?” उसने व्यंग्यपूर्वक सौदागर से पूछा.
सौदागर लज्जित सा हो गया.
एक बार फिर उस वृक्ष तले खामोशी पसर गयी. हवा ने उसे फिर छेड़ना शुरू किया और वह घासों की नरम पत्तियों को छेड़ने लगी.
कुछ देर पश्चात सौदागर ने उसे आवाज दी.
“यहाँ कहीं पानी मिलेगा?”
“पानी किसलिए?”
“हाथ धोने के लिए” सौदागर ने सकुचाते हुए कहा.
वह फिर हँस पड़ी.
“बड़ी जल्दी ये बात याद आयी” वह अपनी हँसी रोकते हुए बोली. “चलिए! पास में एक साफ तालाब है”
सौदागर ने शर्माते हुए कहा.
“किस तरफ है? आप बता दीजिए. मैं चला जाऊँगा.”
“बिल्कुल बता दूँगी, लेकिन उस तरफ एक गंदा वाला तालाब भी है उसमें अगर आप हाथ मुँह धो बैठे तो आपको नहलाना भी पड़ेगा.” वह जोर से हँसने लगी.
“बिल्कुल बता दूँगी, लेकिन उस तरफ एक गंदा वाला तालाब भी है उसमें अगर आप हाथ मुँह धो बैठे तो आपको नहलाना भी पड़ेगा.” वह जोर से हँसने लगी.
सौदागर अपने थैले को समेटने लगा.
“इसे भी धोना है?” वह व्यंग्यपूर्वक सौदागर से पूछी.
सौदागर मुस्कुरा भर दिया.
संकरी पगडंडियों से होते हुए वह आगे आगे भागी चली जा रही थी. सौदागर उसके पीछे पीछे हाँफते हुए दौड़ रहा था. तालाब तक पहुँचते पहुँचते सौदागर धराशाई हो गया. वह जमीन पर बैठ कर बोला –
“ये तालाब पास में था?”
वह फिर हँसी. “आप इतनी ही दूर आने में थक गये?”
“हाँ! इतना भारी थैला जो साथ में है” हाँफते हुए वह बोला.
“अच्छा!! ये छोटा सा थैला इतना भारी है? क्या है इसमें?”
“खुशियाँ….. इसमें ढेर सारी खुशियाँ हैं.” सौदागर ने मुस्कुराते हुए कहा.
व्यंग्यरूपी आश्चर्य से उसने अपनी भौहें तानी और हाथ से इशारा किया – “साफ पानी वाला तालाब….” और मुस्कुरा दी.
तालाब पर जाने से पहले सौदागर ने अपने थैले से कुछ निकालना चाहा – और वह चीख पड़ा
“क्या हुआ?” उसने चिंतित स्वरों में पूछा
“न जाने किसने इसमें काँटे रख छोड़े हैं.”
“आपका थैला… आप जानो… वैसे इसमें खुशियाँ थी न!!” इतना कहकर वह और जोर से हँस पड़ी.
२
….वह अपनी प्रिय सहेली से उस सौदागर के बारे में बताते हुए हँस रही थी और उसकी सहेली उसकी नादानी पर मुस्कुरा रही थी.
“अजनबियों पर इतना भरोसा नही करते. वो सौदागर जैसे बहरूपिये का रूप धरे आते हैं और सब कुछ लूट ले जाते हैं.” आशंका भरे लहजे में उसकी सहेली ने उसे समझाया.
“वह ऐसा नही है. तुम उससे मिली होती न! तो पता चलता.” वह फिर मुस्कुरा दी.
“फिर भी सावधानी तो बरतनी ही चाहिए. आइंदा किसी अजनबी को तालाब वगैरह पर मत ले जाया कर. भरसक यही कोशिश करना चाहिए कि कोई मुँह न लगे. दूर से ही दुआ सलाम करना सीख ले.” उसने मुँह बिचकाकर कहा.
“अजनबियों पर इतना भरोसा नही करते. वो सौदागर जैसे बहरूपिये का रूप धरे आते हैं और सब कुछ लूट ले जाते हैं.”
“वह तो सौदागर है और बोल रहा था कि वह खुँशिया बाँटता है….. अपने थैले से..” वह हँस पड़ी.
“आखिर वह भी सौदागर है. बदले में उसे भी कुछ न कुछ चाहिए होगा. ऐसे ही कोई थोड़े न घूमता है” सहेली ने मुस्कुराकर कहा.
वह चुप सी हो गयी.
“सौदागर होते ही ऐसे हैं…. तू अभी नादान है.”
३
…..सौदागर खिन्न मन से जड़ों पर बैठा था. वह खुश नही लग रहा था. उसने खुशियों के थैले में हाथ डाला और एक काँटा चुभ गया. सौदागर मुस्कुरा दिया.
एक बात उसके मन में तैर रही थी – क्या उसे यहाँ से अब आगे चला जाना चाहिए?
वह अपने प्रति उसकी शंका से बेहद खिन्न था और दूसरे भी उसे घृणित निगाह से देखने लगे थे. उसकी खुशियाँ, शंका और घृणा के बीच पिस कर रह जाती.
ढलती शाम की रोशनी फूट कर बिखर रही थी. वह दूर चला जाना चाहता था.
वह दूर जाना चाहता था जहाँ उसकी खुशियाँ शंका और घृणा से बची रहे. ढलती शाम की रोशनी फूट कर बिखर रही थी और वह खेतों में गिरता संभलता संकरी पगडंडियों से दूर जाते रास्ते की तरफ जाने लगा.
सौदागर अपने चले जाने की उसे सूचना देना चाहता था और वह पगडंडियों से उतरकर वापस उस वृक्ष के पास आया और अपना थैला उसकी जड़ों के पास रखकर एक पत्ते पर लिखा –
“खुशियों का थैला… सिर्फ तुम्हारे लिए…. हमेशा खुश रहो.”
४
सौदागर जा चुका था, दूर जाते रास्ते से होते हुए बहुत दूर… वह वृक्ष के पास रखे थैले को आश्चर्य से निहार रही थी. पत्ते पर लिखे संदेश की हरियाली सूख चुकी थी. उसके शब्द पत्ते के साथ विकृत से हो चुके थे.
उसने थैले को खोलकर उलट दिया. उसमें से कुछ चीजें नीचे गिरीं – काँटें भरी एक सूखी टहनी, कुछ शीशे के टुकड़े, सूखा हुआ गोबर और कुछ रंग बिरंगे पत्थर….
-
मनीष
काँटें भरी एक सूखी टहनी, कुछ शीशे के टुकड़े, सूखा हुआ गोबर और कुछ रंग बिरंगे पत्थर….
इन सब में हमें अपनी खुशियाँ ढूढ़नी है।
खुशियाँ हैं बस उजागर करने का माध्यम चाहिए.
पिगबैक: Blog of the Month- October 2011 | MY DIGITAL NOTEBOOK
kaale rang ka phool!wow!
bro kahani achi he
शुक्रिया!!