जँतसार (कहानी)

अंधेरे में ढिबरी की लौ एक लय में इधर उधर नाच रही थी और उसी लय में मंगली की जेठानी और ननद एक श्रम गीत गा रही थी. मंगली चुपचाप जाँते के हत्थे को एक हाथ से और कभी दूसरे हाथ से पूरा जोर लगाते हुए अपनी तरफ खींच रही थी. जाँते के दोनों पाट की रगड़ से निकलती घर्र घर्र की आवाज की आड़ में वह अपनी कराह छिपा ले जाती. श्रम गीत खत्म होने की कगार पर था. लेकिन ननद ने उसे एक नया मोड़ देते हुए पुनः गाना शुरू किया –

“जतवा ना डोले बेनुलिया ना हिले

रामा किलिया पकरी सुंदरि रौवे हो ना

बाहर त आये लछिमन देवरवा

मोरी भौजी के को गरियावे हो ना”

जेठानी ने इस बार उसका साथ नही दिया और बोली – “बस करो दीदी!! आज इतना ही.. मंगली बेचारी थक गयी होगी. जरा मैं भी हाथ लगा दूँ.”

“भौजी बस एक बार और… फिर जाँता चला लेना न!”

जेठानी ने स्वीकृति दे दी और जाँते के दूसरी तरफ बैठ कर मंगली का साथ देने लगी. मंगली ने थोड़ा राहत महसूस किया. जेठानी इस बार श्रम गीत में अपनी ननद का साथ देते हुए हाँफने सी लगती.

कुछ देर तक वह ऐसे ही गाती रही और फिर एकाएक चुप हो गयी. उसने सिर्फ हाथ से इशारा भर किया कि अब नही. उसकी साँसे तेज हो गयी थी. माथे पर पसीने की ढेर सारी बूँदें उभर आयी थी. ननद उठ कर बाहर चली गयी और जाँते का स्वर लगातार जारी रहा. “घर्र घर्र…”

इस ध्वनि में छिपी हुई चूड़ियों की खनक भी शामिल थी, जो उस शोर में सिर्फ मंगली की जेठानी को सुनाई दे रही थी.

“मैनें मंगल के भैया को कितनी बार कहा कि शहर से जाकर दर्जन भर चूड़ियाँ लेते आना लेकिन उनके कान पर जूँ तक नही रेंगती.”

किशोरवय अन्दाज में हाँफते हुए मंगली ने कहा – “आप मुझसे ले लेना.. मेरे पास ढेर सारी है. मैं कितना पहनूँगी?!”

उसकी जेठानी मुस्कुराई. उसके इस निश्छल व्यवहार से उसे भी वह दिन याद आ गये जब वह मंगली की तरह नई नई ब्याह कर इस घर में आई थी और उसकी चूड़ियाँ ऐसे ही पड़ोस की चाची माँग ले गयी थी. जिसे उसने ऐसे ही बात व्यवहार में दे दिया था और बाद में उसे अपनी सास से खूब डाँट खानी पड़ी थी.

“नीलाम कर दे सारा घर!!” और एक भद्दी सी गाली जिसे वह बचपन से सुनती आ रही थी.

जेठानी ने मुस्कुराकर मंगली से धीमी आवाज में बोला – “अपनी कोई भी चीज दूसरे को देने से पहले बुढ़िया से पूछ लेना. नहीं तो वो सारा घर सिर पर उठा लेगी.”

मंगली ने सिर हिलाकर अपनी जेठानी की बात स्वीकार ली और जाँते की घर्र घर्र सुनते हुए और अपने कंधे के दर्द को सहन करते हुए वह चुप हो गयी.

अभी कुछ दिन पहले ही मंगली की शादी हुई थी. कुछ दिन तक वह एक कोने में पड़ी एक दर्शनीय वस्तु सी पड़ी रही और जब गाँव की सारी औरतों ने उसे देख लिया तो उसे घर के सारे काम करने पड़ते थे. उसकी उम्र अभी पन्द्रह भी नही हुई होगी. उसमें समझ से ज्यादा अभी लड़कपन ही शेष था और वह वैसा ही व्यवहार करती. कभी दौड़ते हुए बर्तन उठा लाती और कभी चूल्हे के पास आ जाती. सास उसे ऐसे दौड़ते हुए देखकर सिर्फ घूरती रहती. जेठानी कभी कभार उसे समझाती है कि अब तेरी शादी हो गयी है बच्चों की तरह घर में दौड़ा मत कर!! लेकिन उसे समझ में नही आता. उसे कहे गये कामों को जल्द से जल्द पूरा करने की जल्दी होती है. उसकी माँ ने कहा भी था कि दौड़ धूप कर सारे काम कर लिया कर इससे पहले कि कोई कुछ कहे. उसे नई नवेली वधुओं जैसी चाल में चलना किसी ने नही सिखाया था. यहाँ तक कि शादी की एक रस्म के दौरान उसके गाँव की एक औरत ने उसे चिढ़ाते हुए कहा था – “छुटकी!! अगर तेरा मरद तेरे उपर चढ़ेगा तो तू क्या करेगी”

“मैं क्या करूँगी!!? एक लात लगाऊँगी और वो दूर जा गिरेगा…” यह कहकर वह विजय मुद्रा में मुस्कुरा दी थी. उस औरत ने हँसते हुए छुटकी की माँ को आवाज दी – “अरे छुटकी की माई!! अपनी बिटिया को मार झगड़ा करने भेज रही है क्या? कुछ समझाया बुझाया नही है.”

…और उस औरत ने छुटकी को अपने अनुभव सुनाना शुरू कर दी थी. जिसे सुनकर छुटकी अपने पैर के अंगूठे से मिट्टी कुरेदती हुई सिर्फ यही रट लगाये थी – “हट्‌…. हट्‌…. मुझे नही करनी शादी वादी!!” और वह लजाते हुए घुटनों के बीच अपने चेहरे को छिपा लेती थी.

शादी के बाद वह छुटकी से मंगली हो गयी थी क्योंकि वह मंगल की लुगाई थी.

जाँते की आवाज एकाएक रूक गयी थी. जेठानी कराहते हुए उठी.

“हाय मोरी मैया!! कल शाम तक इतने में सब परानी खा पी लेंगे. अब कल रात में फिर मेहनत करनी होगी. पिसान (आटा) बटोर ले और इसमें रख देना.”

छुटकी चुपचाप अपने स्थान से उठकर जाँते के चारो तरफ बिखरे आटे को इकट्ठा करने लगी थी और जेठानी बाहर आँगन में आ गयी थी. मंगली ने आटे को एक थैले में रखकर उस जगह को बुहार दिया और अपने माथे से पसीना पोछ कर वह ढिबरी लिए आँगन में चली आई. इसी बीच उसकी सास ने अपनी खाट पर करवट बदली और मंगली को आवाज दी.

“जरा सिर पर तेल रख दे रे मंगली!! बहुत दुःख रहा है. उमर हो गयी है अब तो भगवान दुःख ही लिखेंगे.”

मंगली दौड़कर सरसो का तेल उठा लाई और अपनी सास के सिर पर मालिश करने लगी. इसी बीच खटोले पर सोया हुआ तीन माह का बच्चा जग गया और अपने चारो तरफ गहन अंधकार देखकर जोर से रोना शुरू कर दिया. सास ने जेठानी पर प्रहार किया – “अरे कस्साईकटौनो! लरिकवा काहे रोवत है? चुप कराव ओके.”

जेठानी मंगली के सामने अपमानित महसूस करते हुए भुनभुनाती हुई गुस्से में अपने स्तन बच्चे के मुँह में ठूँस दी.

“ले पी!! चैन से सोया नही जाता? जब देखो तब चिल्लाना शुरू कर देता है.”

उसने अपनी सास को सुनाने के लिए ऐसा कहा था. उसकी सास फिर कराहने का नाटक करने लगती है. मंगली अपनी सास का सिर दबाते हुए एक अजीब से भय को महसूस करती है.

कुछ देर बाद सास सो जाती है और मंगली आँगन के दूसरे कोनें में लगी चारपाई पर अपने बिस्तर के साथ सोने चली जाती है. जाते समय वह अपनी जेठानी से भी पूछती है – “सिर दबा दूँ?” जेठानी ने कहा – “नहीं रहने दे! तेरा हाथ दुःख रहा होगा. जा सो जा… नही तो कुछ देर में सबेर हो जायेगा.”

मंगली चारपाई पर घुटना सिकोड़कर लेट जाती है. कुछ देर वह आसमान पर छिटके तारों को निहारती है लेकिन कल के बिखरे कामों को याद करके वह जल्दी से अपनी आँखें मूद लेती है.

रात का तीसरा पहर शुरू हो चुका था. गाँव के सन्नाटे को चीरते हुए कुछ सियारों की आवाज़ आ रही थी और जिसके जवाब में कुछ कुत्ते भूँकना प्रारम्भ कर देते. कभी कभी कुछ पंछी एकाएक शोर करने लगते और कुछ देर बाद सन्नाटा पुनः पसर जाता.

मंगली की आँखें भारी होने लगी थी और कुछ ही देर में उसे नींद आ गयी.

यह संयुक्त परिवार था. जिसमें १८ लोग थे. पिछले बरस तक कुछ २२ परानी रहा करते थे लेकिन किशन हर रोज के झगड़े से तंग आकर अपने बीवी बच्चों के साथ अलग रहने लगा था. घर के बाहर मरद जात आपस में चतुराई करती और घर के भीतर औरत जात. जो कमजोर और सीधे होते, सारा काम उसी के मत्थे मढ़ दिया जाता. औरतें हर रोज बीमारी का बहाना बनाती ताकि उन्हें घर के काम न करने पड़े और कुछ होशियार पुरूष हफ्ते में सातो दिन शहर जाकर मुकदमें की पैरवी के बाबत सूचना लेने निकल जाते. घर बाहर का सारा काम उन्हीं को करना होता जिन्हें होशियारी और चालाकी नहीं आती.

कुछ औरते ऐसी भी थी जो एक दूसरे के खिलाफ जहर घोलती. मंगली अभी नई थी इसीलिए उसे अभी सास के कोपभाजन का सामना नही करना पड़ा था लेकिन उसकी जेठानी को बदनाम करने में उसकी चचेरी ननद ने कोई कसर न छोड़ी थी जो इससे मीठी मीठी बातें करके सास की सैकड़ों बुराई बतिया के उससे उसकी राय माँगती और वही बातें वह सास को भी बता आती कि आपकी बहू ने आपके बारे में ऐसा वैसा कहा. जिसे सुनकर उसकी सास का पारा गरम हो जाता.

यह घरेलू राजनीति थी. जिसके चक्रव्यूह में सीधी साधी महिलायें फँस जाया करती और दूसरी अन्य महिलायें उनके आपसी झगड़े पर ठठाकर हँसतीं कि बड़ी आई अच्छी बहू खोज कर ले आने वाली.. यह घर और यहाँ होने वाले हर रोज के झगड़े एक रंगमंच का निर्माण करते. जिसमें परिवार के सदस्यों को अपने तरीके से अभिनय करने होते.

सुबह होने में अभी देर थी. मंगली ने अर्धनिद्रा में कुछ सुना. उसकी जेठानी उसे हिलाते हुए कुछ कह रही थी. उसने बच्चों जैसे उंनींदी आवाज में कहा – “उम्म्म्म्म!! क्या?”

“अरे उठ चल!! नहीं तो सवेरा हो जायेगा.. (एक बार फिर झकझोरते हुए) चल उठ जल्दी कर…”

मंगली आँखे मलते हुए बैठ गयी. जेठानी की अगली आवाज आने पर वह बिस्तर से उठ गयी.

सवेरा हो चुका था. चिड़ियों की चहचहाहट और बच्चे के रोने की आवाज के बीच मंगली काले पड़ चुके बर्तनों को घिस घिस कर साफ कर रही थी. इसी बीच मंगल के बड़े भैया कुछ देर के लिए घर के अन्दर आये. सास ने मंगली को झिड़का – “घूँघट तो कर ले बेशरम!”

साड़ी में लिपटी मंगली ने सिर से साड़ी का एक छोर अपने सिर से नीचे तक खींच लिया और वह उसी की आड़ में बर्तनों को रगड़ती रही. उसकी सास एक काले पड़ चुके बर्तन में दही मथ रही थी और जेठानी, जो उम्र में मंगली से दस साल बड़ी थी, चूल्हे से निकल रहे धुँएं में फूँक मार रही थी. उसका बच्चा तरह तरह की आवाजें निकालकर खुश हो रहा था. उसके कमर और पैर में घुँघरू बंधे थे जो उसके पैर हिलाने से बज उठते थे.

मंगल मुँह में दातुन दबाये घर में आता है और अपनी भाभी को छेड़ता हुआ कहता है..

“भौजी !! आज क्या बना रही हो भैया के लिए?”

“तुझे अपने लिए कुछ बनवाना है तो बोल… मंगली को बुला दूँ!?” भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा

मंगल झेंप जाता है. उसकी आँखें मंगली को खोज रही होती है. जँतसार से निकलकर मंगली छम छम करती हुई आटे की थाली लिए चूल्हे के पास आती है. मंगल उसे एक झटके में देखकर सिर नीचे कर लेता है.

“तू काहे छोकरियों की तरह लजा रहा है रे!!?” उसकी भाभी ने उसे चिढ़ाने के लिए कहा

“लजा कहाँ रहा हूँ… मैं तो बस ऐसे ही… ”

“का ऐसे ही?!! ब्याह कर लाया है, देखने में कैसी शरम?!” भाभी खिलखिला कर हँस पड़ती हैं.

मंगली आटे में पानी डालकर गूँथना शुरू कर देती है, और मंगल कुछ देर तक उसे एकटक देखता है.

उलझे से बाल और मासूम सा चेहरा, जिसपर काम करने की तन्मयता साफ झलक रही थी. उसने उसके गालों पर एक चुम्बन की कल्पना की और वापस नीचे देखने लगा.

उसकी भाभी तिरछी निगाहों से उसके इस दर्शन कला को देखकर मुस्कुरा उठी थी .

“देख लिया न!! अब जा बैलों को सानी पानी कर.. नहीं तो अभी हो हल्ला हो जायेगा.”

मंगल उठा और और तेजी से बाहर भाग गया मानो अमृत पा लिया हो.

पूरे दिन घर में पायलों की छम छम गूँजती रही और मंगली को घर के काम काज करते हुए दिन कब ढल गया उसे पता ही न चला. रात का खाना खाने के बाद मंगल ने अपनी भाभी से कहा –

“भौजी!! आज सिर में दरद है जरा मंगली को बाहर भेज देना.”

“अब तेरा भी दरद शुरू हो गया? ठीक है कह दूँगी.” भाभी ने हँसते हुए कहा

मंगल के भैया उसे ऐसे ही बहानों से बाहर मिलने को बुलाया करते थे. मंगल घर से बाहर दूर एक किनारे पर, जहाँ किसी के आने की ज्यादा संभावना नही थी, अपनी चारपाई उठा ले गया और मंगली का बेसब्री से इन्तजार करने लगा.

कुछ देर बाद मंगली अपनी जेठानी का हाथ पकड़े और तेल की शीशी लिए छम छम करती उसके पास आयी. उसकी जेठानी ने उसका हाथ छोड़कर कहा – “ले अब सेवा कर नवाब साहब की. आज नवाब साहब को इस कोने में ही नींद आयेगी.”

“हाँ भौजी!! जाकर अपने राजा साहब के माथे पर तेल धर देना. आज बहुत बोझा ढोना हुआ है..” वह हँसने लगा था.

“चल चल.. बड़ा आया सेवा कराने वाला.. ” इतना कहकर वह वापस घर में चली गयी.

मंगली ने थोड़ा सा तेल मंगल के सिर पर रखकर बालों को रगड़ने लगी और फिर हल्के हाथों से उसका सिर दबाने लगी. मंगल अपनी आँखें बन्द करके उसके हाथों के स्पर्श को महसूस करता रहा. मंगली का हाथ उसके माथे को स्पर्श करता हुआ पुनः बालों में खो गया. मंगल ने एकाएक उसका हाथ पकड़ लिया.

“तेरे हाथों को क्या हुआ?”

“कुछ नहीं” उसने धीमी आवाज में कहा.

“जरा दिखा तो…”

उसके हाथ में छाले उभर आये थे और कुछेक स्थानों पर घाव सूखकर कड़े हो चुके थे.

“अरे!! तू दिन भर क्या करती रहती है? कोई और नही बचा है क्या घर के काम करने को.. तुझे आये अभी कितने दिन हुए ही हैं? जो तू काम पे लग गयी!?”

मंगली चुप रहती है. 

मंगली की हथेलियाँ मंगल हौले से सहलाने लगा. मंगली की आँखें भर आई थी. इन दिनों में पहली बार किसी ने उसकी परवाह की थी.

“अब बस.. तू और काम नही करेगी..”

“काम नहीं करेंगे तो क्या खायेंगे?” एक परिपक्व स्त्री की भाँति उसने यह वाक्य कहा, जिसे वह अपने घर में कुछ औरतों को कहते हुए सुना था.

मंगल चुप हो गया. मंगली हाथ छुड़ा कर उसके बालों में अपनी उँगलियाँ फिराना शुरू कर दी.

मंगल उसके प्रति अपना प्यार दर्शाना चाह रहा था. उसके गालों पर एक चुम्बन लेकर… लेकिन इससे पहले वह कुछ और सोचता, घर के अन्दर से उसकी माँ मंगली को पुकारने लगी. सास की आवाज आते ही मंगली की साँस अटक गयी और वह बिना कुछ बोले तेल की शीशी लिए अन्दर की ओर भागी. पायल की छम छम घर के भीतर समा गयी.

मंगल अपनी चारपाई पर लेटा रहा. उसे अब आसमान पर छिटके तारे नजर आने लगे. कुछ देर तक वह उन्हें निहारता रहा. उसके मन में अलगाववादी भाव उभर रहे थे.

“मैं भी किशन भैया की तरह अलग हो जाऊँगा.. शहर चला जाऊँगा…. वहाँ वह कैसे रह सकेगी?… नहीं नहीं, शहर में नही ले जा सकता..”

वह देर तक अपने विचारों में उलझा रहा. उसकी सोच उन्हीं तारों की तरह दूर दूर छिटकी थी जो सिर्फ नज़र ही आ सकते हैं. नींद के झोंके उसकी आँखों को बंद करने लगे.

जाँते की घर्र घर्र से पूरा घर गूँज रहा था. ढिबरी की लौ पिछली रात की भाँति जेठानी और ननद के गीतों की लय पर नाच रही थी.

ननद गाती – “कवने रे बहाने बखरी जइबे हो राम…”

और जेठानी साथ देते हुए अगली पंक्ति गाती –

“एक हाथे ले लेई घान उपरी से चिपरी हो राम..

अरे अगिया बहाने बखरी जाया हो राम..”

मंगली चुपचाप जाँते के हत्थे को खींचती रहती. उसे इस गीत का मर्म पता था. जिसमें एक नववधू अपने पति से मिलने चोरी छिपे बाहर गयी होती है, वापस आते समय सास उसे पकड़ लेती है और उस पर तरह तरह के लाँछन लगा कर उसे अग्निपरीक्षा देने को प्रेरित करती है. उसका पति अपनी माँ के डरवश चुप रहता है और आखिरकार नववधू अग्निपरीक्षा देती है.

गाने के बोल सुनकर मंगली की साँसे तेज हो जाती है वह और तेजी से जाँते को चलाना शुरू कर देती है और गीत के बोल उभरते रहते हैं..

एक ही सींकिया क बीनली मउनिया हो राम

अरे रामा पर गइनी सासू क नजरिया हो राम

सासू गोड़े मूरे ताने नी चदरवा हो राम

घोड़ा चढ़ल आवे राजा क कुँवरवा हो राम..

  • मनीष


आपके पास एंड्रॉयड स्मार्टफोन हो तो इसे ‘समझना जरूरी है’

एंड्रॉयड स्मार्टफोन की बाज़ार में हिस्सेदारी देखकर सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि इस समय दुनिया में इसके करोड़ों यूजर्स होंगे. इसकी लोकप्रियता ने लोगों के बीच कई अफवाहों को भी जन्म दिया है जिसने कई यूजर्स को भ्रमित किया. लगभग हर रोज ऑनलाइन खरीददारी के लिये स्मार्टफोन देखे जाते हैं. कभी नया फोन लेने के लिये तो कभी यह जानने के लिये कि हमारे फोन से भी तगड़ा कोई नया फोन मार्केट में आया या नहीं. अधिकतर यूजर्स को अपने फोन से कई शिकायतें रहती हैं और वह नया फोन लेने के बारे में सोचने लग जाता है. इस माइंडसेट का फायदा मार्केट में मौजूद कम्पनियाँ उठा रही हैं. अब तो ऐसी-ऐसी कम्पनियाँ खड़ी हो चुकी है जिनका नाम सुनकर ही लगता है कि सब फ्रॉड हैं, लेकिन दोस्तों से उस कम्पनी का गुणगान सुनने के बाद अपनी इस सहजवृत्ति से किनारा कर लिया जाता है और फोन के फीचर्स देखने के बाद तो बस खरीद ही लेने का भाव जागृत हो जाता है. अब यह बात समझने लायक है कि अगर आपके पास एक १०,००० रूपये का एक कम्प्यूटर है जिसमें कि Windows XP installed है. कुछ महीने इस्तेमाल करने के बाद वह धीमा होने लग जाता है, उसके CPU का Fan शोर करने लगता है और एक दिन तो वह बन्द ही हो जाता है. क्या आप उस कम्प्यूटर को कचरे के ढेर में फेंक देंगे? आपको क्या लगता है कि उसका कौन सा पुर्जा खराब हुआ होगा? खैर, कोई बात नहीं. कुछ भी ख़राब हो सकता है. अब पप्पू को एक नये कम्प्यूटर की आवश्यकता है, पप्पू ने आपसे वह ख़राब कम्प्यूटर ६०० रूपये में खरीद लिया, आपने पप्पू को पप्पू समझा और यह सोच कर बेंच दिया कि कबाड़ी वाला तो इसे १० रूपये में भी नहीं लेता. लेकिन पप्पू समझदार निकला उसने पाया कि कम्प्यूटर में कुछ भी ख़राब नहीं है बस Windows XP फिर से इंस्टाल करना पड़ेगा या फिर इसका SMPS (पॉवर सोर्स, बैटरी) बदलना होगा.
स्मार्टफोन एक कम्प्यूटर की तरह ही होता है. उसमें मुख्यतः दो किस्म की ख़राबी आती है. बैटरी कमजोर हो गयी हो या फिर एंड्रॉयड के सिस्टम को कुछ हो गया हो. जो कि गलत चार्जर उपयोग करने के कारण या फिर फालतू के ऑटो-स्टार्ट होने वाले ढेर सारे Apps इंस्टाल करने के कारण होता है. इसके चलते ही फोन गर्म होना, फोन स्लो होना, बैटरी का जल्दी डाउन हो जाना जैसी सेकेण्डरी समस्यायें आती हैं जो कि फोन के मुख्य हार्डवेयर पर असर डाल सकती हैं.

अब तो कुछ कम्पनियाँ खुलकर सामने आ गयी हैं और रिप्लेसमेंट ऑफर के तहत फोन बेंच रही हैं, कभी सोचा है कि वे उस पुराने फोन का क्या करेंगी? यदि आप ने कभी अपने दो ख़राब कम्प्यूटर से एक सही कम्प्यूटर बनाया है तो जरूर समझ सकेंगे.

खैर, अभी हम यहाँ स्मार्टफोन में आने वाली समस्याओं और उसके सुधारने के तरीकों का डेमो पेश करने जा रहे हैं. जैसे कम्प्यूटर की दुनिया में Intel और AMD दो नाम हैं वैसे ही स्मार्टफोन की दुनिया में भी दो नाम हैं – MediaTek और Qualcomm. आपके फोन में इन्हीं दोनों में से किसी एक का Chipset लगा होगा. सामान्यतः MediaTek के प्रोसेसर्स का नाम MT6752 or MT6797 जैसे लिखे होते हैं और Qualcomm में MSM8909 या फिर Snapdragon. सब नाम का भौकाल है, काम एक ही है.
MediaTek chipset वाली डिवाइस में यदि बैटरी के अलावा कोई भी समस्या आती है, जैसे फोन का स्टार्ट न होना, बार-बार री-स्टार्ट होना, स्टार्ट हो के भी स्क्रीन का ऑन-ऑफ होना, मने आँख मारना वगैरह. तो इसके Firmware को एक बार इंस्टाल करके जरूर चेक कर लेना चाहिये. Firmware एक तरह सॉफ्टवेयर्स का एक सेट होता है. हर एक मॉडल के फोन के लिये अलग-अलग होता है. जिसे फोन के eMMC में इंस्टाल किया जाता है. emmc (embedded Multi-Media Controller), मतलब flash memory और flash memory controller एक ही चिप में. इसे फोन की स्मार्ट हार्डडिस्क समझिये. बाकी जो इंजीनियरिंग पढ़े हैं वो सब अपने माइक्रोकंट्रोलर वाली लैब के दिनों में वापस लौट गये होंगे. तो पहला लक्ष्य अपने फोन का Firmware हासिल करना होता है, जिसे Stock ROM के नाम से भी जाना जाता है. कुछ उसी मॉडल के फोन का Custom ROM भी बना कर ऑनलाइन छोड़ दिये हैं लेकिन वह फोन सुधार की अगली श्रेणी में आता है. Stock ROM न मिले तो Custom ROM से ही ट्राई किया जा सकता है. यह सब तभी करें जब समस्या गम्भीर किस्म की हो. फोन का स्लो होना तो Hard Reset के जरिये सही हो जाता है. उसके वीडियो यूट्यूब पर बहुतायत में मिल जायेंगे.

सामान्यतः MediaTek की eMMC, GPT (GUID – globally unique identifiers, Partition Table) में होती है. पार्टीशन तो आप समझ ही रहे होंगे. अधिक जानकारी प्राप्त करनी हो तो FAT, FAT32, NTFS, ext2, ext3, ext4 जैसे शब्द सर्च कर सकते हैं. कभी Linux प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया होगा तो यह सब पता ही होगा. UEFI के बारे में भी सर्च कर सकते हैं, मामला क्लियर हो जायेगा. हाँ तो eMMC स्टोरेज (SD, वही फ्लैश मेमोरी), GPT में होती है जो कई भागों में बँटी होती है और सबके लिये एक फिक्स्ड साइज allocate होती है. जिसमें फोन का Firmware इंस्टाल किया जाता है.

उदाहरण के लिये, अपने एक MediaTek device की eMMC को १२ पार्टीशन्स में विभाजित किया गया है. अलग-अलग devices के लिये इनके अलग-अलग नाम हो सकते हैं. क्रमशः इनके नाम है – PRELOADER, DSP_BL, MBR, EBR1, UBOOT, BOOTIMG, RECOVERY, SEC_RO, LOGO, ANDROID, CACHE, USERDATA. इन पार्टीशन्स के नाम देखकर इनके काम का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है. जैसे LOGO में वह फाइल होती है जो फोन स्टार्ट होते ही आपको दिखती है. इसे आप अपने हिसाब से customize भी कर सकते हैं और फोन के ब्रांड नेम के स्थान पर अपनी प्रियतमा की क्यूट सी तस्वीर लगा सकते हैं, उसी से फोन स्टार्ट करा के उसे गुदगुदा भी सकते हैं, आखिर आधे से एक मिनट तक Boot होते समय फोन उसी पर अटका ही रहता है. सम्भावनायें बहुत है इस फील्ड में इसीलिये ध्यान से चीजों को समझिये.

USERDATA वह हिस्सा होता है जिसे आप फोन की internal memory कहते हैं. ANDROID वह हिस्सा है जिसमें SYSTEM files होती हैं अधिकतर इसी में कुछ फाइलें इधर उधर हो जाती हैं, जब फोन Root किया गया हो तो… इसीलिये विशेषकर इसी पार्टीशन को ही Flash किया जाता है. बाकी किसी पार्टीशन में कोई समस्या होने के बेहद कम चांस होते हैं. RECOVERY, यह हिस्सा फोन को उस स्टेट में वापस लाने के लिये होता है, जब आपने फोन नया-नया खरीदा था. Hard reset जब करते हैं तो हम इसी हिस्से को एक्सेस कर रहे होते हैं, boot in recovery नाम तो सुना ही होगा. यदि आपकी फोन कम्पनी ने अपनी तरफ से कोई App आपके फोन में इंस्टाल किया है, जो कि System App नहीं है तो वह इसी हिस्से में रहता है.

अब बात आती है कि इन पार्टीशन्स में आयी विसंगतियों को कैसे दूर किया जाय. इसके लिये, मतलब MediaTek Devices के लिये एक SP (Smart Phone) Flash Tool आता है. जिसमें हमें firmware में उपस्थित एक Scatter txt फाइल को सेलेक्ट करना होता है, यह सिर्फ इसलिये है कि कहीं आप दूसरे पार्टीशन वाली फाइल किसी तीसरे में न घुसेड़ दें. उसे सेलेक्ट करते ही सारी फाइल्स नाम सहित आ जायेंगी, सही टारगेट में जाने के लिये. तस्वीर लगी है, देख सकते हैं. अब इसमें जरूरी नहीं कि आप सब पार्टीशन flash करो. आप पहले Android को फ्लैश कीजिये, Cache के साथ… और कुछ सेकण्डस की प्रक्रिया सफलता पूर्वक पूरी होने के बाद अपने फोन को स्टार्ट करके देख लीजिये. सही हो गया हो तो ठीक नहीं तो बाकी के पार्टीशन्स कहाँ भागे जा रहे हैं. सबको एक साथ निपटा दीजिये.
sptool

पार्टीशन्स को फ्लैश करने के पहले SP Flash Tool में सब सेट कर लीजिये. फिर ऊपर Download का एक ऑप्शन होगा उसे अपने फोन को USB के जरिये Download mode में कनेक्ट करने से पहले ही क्लिक करके छोड़ दीजिये. अब ये डाउनलोड मोड क्या होता है इसे समझना जरूरी है. MediaTek devices को जब हम स्विच ऑफ कर देते हैं और उसकी बैटरी निकाल देते हैं और पुनः बैटरी लगाने के बाद जैसे ही USB से कनेक्ट करते हैं तब फोन कुछ सेकण्ड्स के लिये Download Mode में आता है. अपने कम्प्यूटर में Device manager open करके आप बैठे रहेंगे तो वह आपको उसकी सूचना देगा, उसका ड्राइवर इंस्टाल करना बहुत जरूरी है, जिसे MTK USB VCOM Driver के नाम से भी जानते हैं. नहीं तो पलक झपकते ही वह गायब हो जायेगा और आप समझेंगे कि कुछ हो नहीं रहा, सब फालतू है. उसका ड्राइवर मैनुअली इंस्टाल किया जा सकता है, जैसे ही वह डिवाइस डिटेक्ट हो वैसे ही उस पर राइट क्लिक कर देना है फिर वह भले ही गायब हो जाये लेकिन आपको एक विशेष ड्राइवर को मैनुअली इंस्टाल करना होगा. यह ड्राइवर आपको अपनी डिवाइस के लिये खोजना होगा, Firmware के अतिरिक्त. इस सब काम के लिये Windows XP or Windows 7 प्लेटफॉर्म उपयोग में लाना जरूरी है.

कम्प्यूटर पर SP Flash Tool के Download बटन को क्लिक करके छोड़ देने के बाद वह डिवाइस कनेक्ट होने की प्रतीक्षा करता है और जैसे ही आप अपने फोन की बैटरी निकालकर और पुनः लगाकर USB के जरिये जोड़ते हैं तो तुरन्त ही फ्लैश होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिसको पूरा होने में मात्र 20-30 सेकण्ड्स लगते हैं. बस आपका फोन एकदम नया बन गया. फिर उसके साथ चाहे जो कीजिये. Root कीजिये, बवाल काटिये, जो करना हो करिये… बिना बिगड़ जाने का डर लिये हुए… बिगड़ जाये तो यही कुछ सेकण्ड्स का काम फिर कर लीजिये… किसने रोका है. इससे होगा यह कि आप बहुत कुछ नया सीखेंगे. असली आज़ादी इसी को कहते हैं… और वारंटी lapse हो जाने का डर दिमाग से निकाल दीजिये. इस प्रक्रिया के बाद उनके अब्बा जान भी नहीं बता पायेंगे कि आपने फोन को root किया था या नहीं. क्योंकि फोन की मैन्यूफैक्चरिंग के बाद इंस्टालेशन की यही प्रक्रिया अपनायी जाती होगी. हाँ सैमसंग की कुछ डिवाइस में इसका हिसाब रखने के लिये भी अलग से एक मेमोरी लगायी गयी है, लेकिन बच्चे उसे भी साफ कर डालते हैं. Free के प्लेटफॉर्म पर बेड़ियाँ लगाने का कोई फायदा नहीं. Android highly customizable प्लेटफॉर्म है.

अब आते हैं Qualcomm devices की तरफ. इसमें जो eMMC लगी होती है उसका भी पार्टीशन GPT ही होता है. JIO 4G नामक सरकारी सुविधा का लाभ उठाने के लिये हमने LYF Wind 4 (LS-5014) नाम का फोन लिया था, इसमें Qualcomm chipset लगी है. अब होता यह है कि इन सस्ते फोन में स्टोरेज नाम मात्र का होता है और अधिक RAM खाने वाले एप्लीकेशन्स सिस्टम में दे रखे होते हैं, यहाँ तक कि गूगल क्रोम को भी. जिससे बचने का एक उपाय यह है कि आप उन Apps को सेटिंग्स में जाकर Disable कर दें, और जो App internal storage में installed हैं उन्हें Force Stop कर दिया जाय. इस App Hibernation प्रक्रिया के लिये भी कुछ Apps आते हैं लेकिन ज्यादा देर तक वे सम्भाल नहीं पाते. मानो RAM दावत खाने वाला कोई Hall हो जिसमें सब घुसना चाहते हैं, लेकिन दरबान मजबूत न हो तो सब ठेलकर एक साथ अन्दर घुस आयेंगे और मामला और दिमाग दोनों गरम हो जायेंगे. अब फोन लिया है तो दो तीन App भी न रखें तो कैसे काम चलेगा, जो मशहूर किस्म के सोशल साइट्स वाले मैसेजिंग Apps हैं उनकी साइज इतनी है कि पूरा स्पेस भर जाये और तो और हर तीसरे दिन आने वाले उनके अपडेट्स, उपर से दनादन फोटो, म्यूज़िक भेजने वाले दोस्त. यह सब मैनेज करने के लिये हमने फोन को Root करने का मन बनाया. वारंटी lapse होने का डर किसी और को देना साहब, लेकिन हमसे हमारी आज़ादी नहीं छीन सकते, ऐसे डायलॉग के साथ हमने सबसे पहले अपने फोन का Firmware खोजा. हमेशा याद रखिये, अपने फोन को Root करने से पहले अपने फोन का सही Stock ROM खोजकर रख लेना ही समझदारी होती है. तभी आगे कुछ किया जा सकता है, ऐसे जोश जोश में होश खो देना अच्छी बात नहीं. सौभाग्य से एक जगह से हमें LYF WIND 4 का Stock Firmware मिल गया और उसे सुरक्षित रख लिया था. उसके दो महीने बाद जब फोन में उत्पात मचा रहे Jio के Apps ज्यादा RAM इस्तेमाल करने लगे तो सबको निपटाने का मन किया. हाँलाकि उनके Apps को वर्चुअल Android Platform AMIDuOS पर कम्प्यूटर पर ही इस्तेमाल करते हैं जैसे कि JioTV App से कम्प्यूटर पर ही प्राइम टाइम देखना. लेकिन BSNL भाई साहब हैं, इनका कोई भरोसा नहीं.

firmware

इन सब परिस्थितियों से निपटने के लिये फोन को Root कर देने का प्लान बन गया. इसके लिये Kingroot नाम का एक App आता है. बस एक क्लिक में अपने फोन को root किया जा सकता है. बशर्ते फोन इंटरनेट से कनेक्टेड हो और कनेक्शन स्टेबल हो, नहीं तो फोन रीस्टार्ट होकर पुनः प्रयास करेगा. हाँलाकि इसमें कोई खतरे वाली बात नहीं होती. Kingroot की ख़ास बात यह है कि जब आपको फोन unroot करना हो तो उसे उसके menu bar के ऑप्शन में जाकर उसे uninstall भी कर सकते हैं. वारंटी खत्म होने से डरे हुए प्राणियों के लिये यह सबसे अच्छा साधन है. भारत में अभी सर्विस सेण्टर में काम करने वाले इतने टैलेंटेड नहीं है जितने कि यहाँ के बेरोजगार. इसीलिये एक क़ाबिल बेरोजगार बनने का प्रयत्न करना चाहिये. ताकि अगर आगे कुछ न हुआ तो अपनी क़ाबलियत से ही नोट छापा जा सके. मरीजों की संख्या की तुलना में डॉक्टर्स की संख्या हमेशा कम ही रहती है.

अब Rooted phone होने का एक फायदा यह होता है कि RAM खाने की होड़ मचाने वालों को सोमरस पिलाकर गहरी निद्रा में भेजा जाना आसान हो जाता है और किसी की हिम्मत नहीं होती बिना आपसे पूछे RAM में घुसने की. जब जिस App की जरूरत हो उसे इस्तेमाल कीजिये और उससे बाहर निकलते ही वह Auto-kill हो जायेगा. इससे आपकी बैटरी की खपत कम होगी, फोन गर्म नहीं होगा और फोन हैंग होने की समस्या नहीं आयेगी. लेकिन एक बार Administrator बन जाने के बाद कैसे इच्छायें बड़ी होने लगती हैं यह अधिकारियों से पूछिये. हमने सोचा कि यह काम हो गया है तो दूसरा काम भी कर लेते हैं. दूसरा काम मतलब internal storage की साइज बढ़ाना. लॉलीपॉप वर्जन से पहले वाले एंड्रॉयड वर्जन्स में यह काम आसान था. लेकिन इसमें आसानी से external SD card को as a internal memory swap नहीं कर सकते हैं. इसलिये Link2SD App का सहारा लिया गया. यह Apps को External SD के ext4 पार्टीशन में भेज तो देता था लेकिन data और cache, internal memory में ही रह जाती थी. फेसबुक नामक राक्षस तो पूरा स्पेस कब्जा कर लिया था. इनसे निपटने के लिये Link2SD Plus लेने की इच्छा आयी. अब भारत में भला app कौन खरीदता है, सब patch करके काम चलाते हैं. लेकिन वह प्रक्रिया कई कोशिशों के बाद भी सम्पन्न नहीं हो पायी. तब Kingroot को SuperSu से बदलने का आइडिया मन में आया. मतलब एक साहब को दूसरे साहब से रिप्लेस कर देना. काम आसान था, लेकिन दोनों साहब आपस में भिड़ गये. इसने इनकी फाइल गायब कर दी और उसने इनकी. न खायेंगे, न खाने देंगे वाला हिसाब-किताब समझ लीजिये. अब इसका असर यह हुआ कि फोन स्टार्ट होने के बाद System का User Interface लोड ही नहीं होता था. मतलब Menu option का गायब हो जाना.

अब फोन के लिये डाउनलोड किये हुए Stock Firmware की आवश्यकता पड़ेगी. क्योंकि Hard Reset करने के बाद भी समस्या दूर नहीं हुई. जाहिर है समस्या सिर्फ सिस्टम वाले हिस्से में है. Stock Firmware की zip फाइल पहली बार unzip करने के बाद उसमें एक टूल नज़र आता है. पहले का अनुभव यही कहता है कि इसी टूल के जरिये ही फोन के पार्टीशन्स को फ्लैश करना है. इसे पूर्वाग्रह कहते हैं. जब पूर्वाग्रह दिमाग पर हावी होता है तब नयी चीजों की समझ ब्लॉक हो जाती है. मोटरसाइकिल वाला भी कार को किक मारकर स्टार्ट करने का आइडिया पहले पहल लगायेगा, यदि उसने पहले कभी कार को स्टार्ट होते न देखा हो तो. जीवन में तमाम मुश्किलें ऐसे ही आती हैं. मतलब आप समझ गये होंगे कि समस्या दूर होने की बजाय और बढ़ने वाली है. हमने उस टूल का इस्तेमाल सिर्फ इसलिये किया क्योंकि वह Firmware के साथ है, और अनुमान लगाया कि यही सही टूल होगा. लेकिन हम गलत थे… और अब हम अपने फोन की बेसिक जानकारी जैसे IMEI, WIFI MAC ID, Bluetooth, Speakers के configuration से भी हाथ धो बैठे. फोन की इस हालत को देखकर सारी उम्मींदों का ख़त्म हो जाना स्वाभाविक है. जब अपने ही बेवफा निकल जायें तो गैरों पर क्या भरोसा करना. लेकिन उम्मींदों का दामन थामे हम लॉजिक का सहारा लिये और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यदि फोन में Su binary फिर से install किया जा सके तो शायद काम बन सकता है. Su binary का अर्थ root करने से है. लेकिन फोन को अब कैसे root किया जाय जब वह स्टार्ट ही नहीं हो रहा है तो… इसके लिये Kingroot का ही एक Desktop version आता है. उससे USB debug मोड में फोन को जोड़कर root किया जा सकता है. फोन पहले से ही Developer Mode में था, इसे ऑन करने के लिये Settings>About Phone>Build_Number पर 7-8 बार टच करके developer हुआ जा सकता है और फिर back आकर Developer options में USB Debugging mode को ऑन किया जा सकता है. उसी के ऊपर OEM unlocking का ऑप्शन भी होता है, जिसे ऑन करने से bootloader unlock हो जाता है. इससे आप अपने फोन के उन पार्टीशन्स को flash कर सकते हैं fastboot प्रोटोकॉल के जरिये.

हमने अपने फोन के आँख-कान पहले से ही खोल रखे थे. मतलब USB debugging और OEM unlocking के दोनों ऑप्शन ऑन थे. MediaTek और Qualcomm दोनों के जो बने बनाये Flash tool हैं वे Windows OS पर ही काम करते हैं. लेकिन यह fastboot और adb (Android Debug Bridge) के कमांड्स Linux और विंडोज़ दोनों पर काम करते हैं. विंडोज में यह सुविधा लाने के लिये इस छोटे से सॉफ्टवेयर को इंस्टाल करना होगा और Linux पर installation के लिये टर्मिनल में इस मंत्र का प्रयोग करना होगा.

sudo apt-get install android-tools-adb android-tools-fastboot

यह इंस्टाल हो जाने के बाद आप Windows में Command prompt या फिर Linux में Terminal का इस्तेमाल कर सकते हैं. Windows में इस्तेमाल करने के लिये फोन का USB Diag driver इंस्टाल करना होगा लेकिन Linux में यह सब झंझट नहीं है. हमने Ubuntu पर यह सब किया था लेकिन इधर विंडोज़ की तस्वीरें ही प्रयोग करेंगे. काम वही है, बस पतंग उड़ाने की छत अलग-अलग है.

तो यहाँ से शुरू करते हैं, कि Qualcomm devices के पार्टीशन्स की जानकारी कैसे हासिल की जाये और फिर उसे कैसे flash किया जाय.

तो अब steps –

Open Command prompt

> adb devices (यह जाँचने के लिये कि डिवाइस सही से कनेक्टेड है या नहीं)

> adb shell (इससे फोन के सिस्टम में प्रवेश किया जाता है, ‘>’ sign सिर्फ यह प्रकट करने के लिये है कि आप अभी कमांड कहाँ लिख रहे हैं, Windows OS)

$ cd /dev/block/platform ($ sign का मतलब अब आप फोन के भीतरी हिस्से में पहुँच चुके हैं, Linux यूजर्स को तो सब पता ही होगा)

$ ls (इसके जरिये आप अपने emmc का assigned name पता कर सकते हैं, जैसे मेरे लिये यह 7824900.sdhci है, यह कुछ भी हो सकता है, इसीलिये एक बार चेक कर लेना सही रहता है.)

$ cd 7824900.sdhci (उदाहरण के लिये हमने अपना लिखा है, आप अपना लिखियेगा)

$ ls (इससे एक बार फिर contents की जानकारी हासिल करने के लिये)

$ cd by-name

$ ll

इसके बाद कुछ ऐसा नज़ारा दिखेगा. आप बस दाहिने से दो चीजों पर फोकस कीजिये, जैसे DDR और /dev/block/mmcblk0p17. DDR पार्टीशन का नाम है और /dev/block/mmcblk0p17 उस पार्टीशन का path.
cmd

इसमें कुल 29 Partitions हैं. जिनके नाम पता चल चुके हैं… और कौन सा पहला पार्टीशन है, कौन सा दूसरा यह mmcblk0 के बाद लिखी संख्या से पता चल जायेगा. जैसे पहला पार्टीशन p1 – modem है, p2 – sbl1 है etc.

यहाँ इनके नाम ही बहुत काम के हैं, इनके नाम से ही आगे का हवन सम्पन्न होगा fastboot के जरिये… और ध्यान देने की बात यह कि यह हर फोन में अगल-अलग होता है, इसे समझने के लिये आप इस वेबपेज को देख सकते हैं.

अब आगे कुछ करने से पहले आप अपने प्रत्येक पार्टीशन का एक बैकअप ले सकते हैं. इसे तकनीकी भाषा में dump करना भी कहते हैं. मतलब वहाँ से उठाया और इधर लाकर पटक दिया. इसके लिये फोन का rooted होना आवश्यक है. अगर फोन rooted न हो तो चिन्ता की बात नहीं. इस स्टेप को छोड़कर आगे बढ़ जाइये. जब फोन सही हो जाये तो उसे root करके यह काम करना चाहें तो कर सकते हैं. कल किसने देखा. हो सकता है आप iPhone ही ले लें.

बैकअप लेने की प्रक्रिया –

> adb shell

$ su

$ dd if=/dev/block/mmcblk0p1 of=/sdcard/modem.bin (ध्यान देने की बात है कि modem के आगे हमने .bin extension क्यों लगाया. इसके लिये आप अपने फोन के Firmware फोल्डर में जाकर वहाँ मौजूद सभी files का file extension देख सकते हैं. इधर का जो नाम उधर न मिले तो उसको .mbn extension या बिना कोई extension के ही save कर सकते हैं. Of=/sdcard यह आपकी इंटरनल मेमोरी का path है. यह कुछ और भी हो सकता है, जैसे मेरे लिये यह of=/storage/emulated/0/ है.

$ dd if=/dev/block/mmcblk0p2 of=/sdcard/sbl1.mbn

ऐसे ही सभी 29 आइटम्स के लिये कीजिये. With proper extensions. Firmware से देख देख के… जिसका समझ न आये कि क्या extension देना है उसे कोई extension मत दीजिये.

सामान्यतः modem, modemst1 और modemst2 में ही IMEI, WIFI जैसी सूचनायें स्टोर होती हैं. किसी-किसी qualcomm device में efs नाम का पार्टीशन बना होता है ext4 format में… उसमें यह सारी सूचनायें होती हैं. कहने का मतलब यह है कि बेसिक्स समझ लेने के बाद कम्पनी वाले काका लोग चाहे जो ढाँचा बना के दे दें आप समझ जायेंगे कि क्या करना है.

हाँ तो अब fastboot के जरिये flash कैसे किया जाय, इसका तरीका.

> adb reboot bootloader (इससे bootloader mode में फोन आ जायेगा.)

आप command prompt के जरिये जिस भी फोल्डर में हैं उसमें Firmware की वो सारी फाइल्स save रखिये जो उन 29 partitions के नाम से मिलती हों. हाँलाकि कुछ नाम अलग हो सकते हैं उन्हें पहचानना आसान भी है. जैसे aboot के लिये firmware में emmc_appsboot.mbn नाम की फाइल दी हुई है, modem के लिये NON-HLOS.bin नाम की फाइल है, जिसमें कृपा अटकी हुई है. मतलब इसी फाइल के जरिये हमारी IMEI, Wifi, Sound वाली समस्या सुलझ गयी थी. इसका अन्दाज़ा हमने फाइल की साइज और पार्टीशन की साइज देखकर लगाया था, आखिर लॉजिक का और काम ही क्या है. पार्टीशन की साइज पता करने के लिये अलग उपाय है. जो कि rooted फोन में ही सम्भव है. एक parted नाम की फाइल को /system/bin में भेजकर परमिशन बदलना होता है. (chmod 0755 /system/bin/parted). इसकी जरूरत वैसे नहीं पड़ती. लेकिन समझने का शौक रखने वाले समझने के लिये गज़ल की डेप्थ नाप ही आते हैं. इसमें सारे पार्टीशन्स क्रम से दिखायी देते हैं, साइज के साथ.
cmd1

अब सबसे पहले sytem से शुरू कीजिये.

> fastboot erase system

******** Did you mean to fastboot format this partition?

erasing ‘system’…

OKAY [0.048s]

finished. total time: 0.048s

> fastboot flash system system.img

इसके बाद cache. इसका कोई फिक्स्ड order नहीं है, अपनी बुद्धि के अनुसार जिसे पहले निपटाना चाहे निपटा सकते हैं.

> fastboot erase cache

> fastboot erase userdata   (cache और userdata को blank ही रखा जाता है, यदि userdata का कोई बैकअप ले रखा हो तो जरूर उस फाइल के जरिये flash किया जा सकता है. इतना तो समझते ही होंगे.)

> fastboot flash boot boot.img

> fastboot flash recovery recovery.img

इतने में आपका फोन सही हो जायेगा. अगर आपके फोन की IMEI, wifi वाली सूचनाओं के साथ कोई दुर्व्यवहार नही हुआ हो तो.

जिसने उसे भी नहीं छोड़ा है उसके लिये पहले NON-HLOS.bin फाइल का नाम बदलकर modem.bin रख दीजिये.

> fastboot flash modem modem.bin

इसके बाद सारी सूचनायें वापस आ जानी चाहिये. अगर नहीं आती हैं तो modemst1, modemst2 का नम्बर लगाया जा सकता है, इनकी बैकअप फाइल्स के जरिये, मतलब Dump प्रक्रिया से निकली files के जरिये. कुछ न हो तो fsg नाम का एक पार्टीशन है, यह भी उन्हीं सूचनाओं को स्टोर करने के लिये बना पार्टीशन है. साइज देखकर अन्दाज़ा लग जायेगा. इसके जरिये ऑटोमैटिक आपकी IMEI वाली सारी सूचनाये वापस लौट आयेंगी. अन्य qualcomm devices के लिये efs पार्टीशन का बैकअप लेना होता है. कभी कभार तो वह partition mount नहीं होता, तो उसे ext4 में फॉर्मेट करके जबरन माउंट किया जाता है… और सब सही हो जाता है.

इस स्टेज तक आपका फोन बिल्कुल सही हो जायेगा. लेकिन पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त.
fota-lyf-wind-4-ls-5014

यदि FOTA के जरिये wireless update बिना किसी समस्या के install होने देना चाहते हैं तो कुछ और काम करने की जरूरत है.

(sbl1, sbl1bak, aboot, abootbak, tz, tzbak, rpm, rpmbak. इन 8 partitions को Firmware folder में मौजूद इन्हीं के .mbn फाइल से निपटाना होगा.)

> fastboot flash sbl1 sbl1.mbn

> fastboot flash sbl1bak sbl1bak.bin (sbl1.mbn फाइल का नाम बदलकर sbl1bak.mbn कर दीजिये)

ऐसे ही emmc_appsboot.mbn जिसका नाम बदलकर aboot.mbn करने के बाद aboot और abootbak के साथ यही सलूक कीजिये.

> fastboot flash aboot aboot.mbn

> fastboot flash abootbak abootbak.bin (aboot.mbn को ही rename करके abootbak.bin)

यही प्रक्रिया tz, tzbak और rpm, rpmbak के साथ कीजिये. Firmware के फोल्डर में tz.mbn और rpm.mbn दी गयी हैं. फिर इन्ही को rename करके tzbak और rpmbak को भी निपटा डालिये. Fastboot कमांड के जरिये. इसके बाद कहीं भी कोई issue नहीं होगा. फोन जैसे नया लिया था बिल्कुल वैसा ही हो जायेगा. इन प्रक्रियाओं के देखकर समझ जाइये कि वारंटी वाला डर बेबुनियाद है. सीखिये, जानिये और समझिये. फोन जीवन भर साथ नहीं रहेगा, हो सकता है कि आगे मँहगे फोन आयें. इसे समझे रहेंगे तो उन्हें ख़राब नहीं करेंगे… और असल में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले स्मार्ट यूजर बनेंगे. मतलब गांडीवधारी अर्जुन.

जैसे बिना फोन को टच किये हुए उसमें कोई एप्लीकेशन इंस्टाल करना हो तो > adb install app_name.apk

इति श्री महाभारत कथा.

साफ माथे का समाज – अनुपम मिश्र

तैरने वाला समाज डूब रहा है.

जुलाई (2004) के पहले पखवाड़े में उत्तर बिहार में आई भयानक बाढ़ अब आगे निकल गई है. लोग उसे भूल गए हैं. लेकिन याद रखना चाहिए कि उत्तर बिहार उस बाढ़ की मंजिल नहीं था. वह एक पड़ाव भर था. बाढ़ की शुरुआत नेपाल से होती है, फिर वह उत्तर बिहार आती है. उसके बाद बंगाल जाती है. और सबसे अंत में- सितम्बर के अंत या अक्टूबर के प्रारंभ में- वह बांग्लादेश में अपनी आखिरी उपस्थिति जताते हुए सागर में मिलती है. इस बार उत्तर बिहार में बाढ़ ने बहुत अधिक तबाही मचाई. कुछ दिन सभी का ध्यान इसकी तरफ गया. जैसा कि अक्सर होता है, हेलीकॉप्टर आदि से दौरे हुए. फिर हम इसको भूल गए.

बाढ़ अतिथि नहीं है. यह कभी अचानक नहीं आती. दो-चार दिन का अंतर पड़ जाए तो बात अलग है. इसके आने की तिथियां बिल्कुल तय हैं. लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि यह अचानक आई विपत्ति है. इसके पहले जो तैयारियां करनी चाहिए, वे बिल्कुल नहीं हो पाती हैं. इसलिए अब बाढ़ की मारक क्षमता पहले से अधिक बढ़ चली है. पहले शायद हमारा समाज बिना इतने बड़े प्रशासन के या बिना इतने बड़े निकम्मे प्रशासन के अपना इंतजाम बखूबी करना जानता था. इसलिए बाढ़ आने पर वह इतना परेशान नहीं दिखता था.

इस बार की बाढ़ ने उत्तर बिहार को कुछ अभिशप्त इलाके की तरह छोड़ दिया है. सभी जगह बाढ़ से निपटने में अव्यवस्था की चर्चा हुई है. अव्यवस्था के कई कारण भी गिनाए गए हैं- वहां की असहाय गरीबी आदि. लेकिन बहुत कम लोगों को इस बात का अंदाज होगा कि उत्तर बिहार एक बहुत ही संपन्न टुकड़ा रहा है इस प्रदेश का. मुजफ्फरपुर की लीचियां, पूसा ढोली की ईख, दरभंगा का शाहबसंत धान, शकरकंद, आम, चीनिया केला और बादाम और यहीं के कुछ इलाकों में पैदा होने वाली तंबाकू, जो पूरे शरीर की नसों को हिलाकर रख देती है. सिलोत क्षेत्र का पतले से पतला चूड़ा जिसके बारे में कहा जाता है कि वह नाक की हवा से उड़ जाता है, उसके स्वाद की चर्चा तो अलग ही है. वहां धान की ऐसी भी किस्में रही हैं जो बाढ़ के पानी के साथ-साथ खेलती हुई ऊपर उठती जाती थीं और फिर बाढ़ को विदा कर खलिहान में आती थीं. फिर दियारा के संपन्न खेत.

सुधी पाठक इस सूची को न जाने कितना बढ़ा सकते हैं. इसमें पटसन और नील भी जोड़ लें तो आप ‘दुनिया के सबसे बड़े’ यानी लंबे प्लेटफार्म पर अपने आप को खड़ा पाएंगे. एक पूरा संपन्न इलाका उत्तर बिहार आज दयनीय स्थिति में क्यों पड़ गया है? हमें सोचना चाहिए. सोनपुर का प्लेटफार्म. ऐसा कहते हैं कि यह हमारे देश का सबसे बड़ा प्लेटफार्म है. यह अंग्रोजों के समय में बना था. क्यों बनाया गया इतना बड़ा प्लेटफार्म ? यह वहां की संपन्नतम चीजों को रेल से ढोकर देश के भीतर और बाहर ले जाने के लिए बनाया गया था. लेकिन आज हम इस इलाके की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं और उसे एक तरह से लाचारी में छोड़ बैठे हैं.

बाढ़ आने पर सबसे पहला दोष तो हम नेपाल को देते हैं. नेपाल एक छोटा-सा देश है. बाढ़ के लिए हम उसे कब तक दोषी ठहराते रहेंगे? कहा जाता है कि नेपाल ने पानी छोड़ा, इसलिए उत्तर बिहार बह गया. यह देखने लायक बात होगी कि नेपाल कितना पानी छोड़ता है. मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि नेपाल बाढ़ का पहला हिस्सा है. वहां हिमालय की चोटियों से जो पानी गिरता है, उसे रोकने की उसके पास कोई क्षमता और साधन नहीं है. और शायद उसे रोकने की कोई व्यवहारिक जरूरत भी नहीं है. रोकने से खतरे और भी बढ़ सकते हैं. इसलिए नेपाल पर दोष थोपना बंद करना होगा.

यदि नेपाल पानी रोकेगा तो आज नहीं तो कल हमें अभी की बाढ़ से भी भयंकर बाढ़ झेलने की तैयारी करके रखनी पड़ेगी. हम सब जानते हैं कि हिमालय का यह हिस्सा कच्चा है और इसमें कितनी भी सावधानी और ईमानदारी से बनाए गए बांध किसी न किसी तरह से प्रकृति की किसी छोटी सी हलचल से टूट भी सकते हैं. और तब आज से कई गुना भयंकर बाढ़ हमारे सामने आ सकती है. यदि नेपाल को ही दोषी ठहराया जाए तो कम से कम बिहार के बाढ़ नियंत्रण का एक बड़ा भाग- पैसों का, इंजीनियरों का, नेताओं का अप्रैल और मई में नेपाल जाना चाहिए ताकि वहां यहां की बाढ़ से निपटने के लिए पुख्ता इंतजामों के बारे में बातचीत की जा सके. बातचीत मित्रवत हो, तकनीकी तौर पर हो और जरूरत पड़े तो फिर मई में ही प्रधानमंत्री नहीं तो प्रदेश के मुख्यमंत्री ही नेपाल जाएं और आगामी जुलाई में आने वाली बाढ़ के बारे में चर्चा करके देखें.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम बाढ़ के रास्ते में हैं. उत्तर बिहार से पहले नेपाल में काफी लोगों को बाढ़ के कारण जान से हाथ धोना पड़ा है. पिछले साल नेपाल में भयंकर भूस्खलन हुए थे, और तब हमें पता चल जाना चाहिए था कि अगले साल हम पर भी बड़ा संकट आएगा, क्योंकि हिमालय के इस कच्चे भाग में जितने भूस्खलन हुए, उन सबका मलबा वहीं का वहीं पड़ा था और वह इस वर्ष की बरसात में नीचे उतर आने वाला था.

उत्तर बिहार की परिस्थिति भी अलग से समझने लायक है. यहां पर हिमालय से अनगिनत नदियां सीधे उतरती हैं और उनके उतरने का एक ही सरल उदाहरण दिया जा सकता है. जैसे पाठशाला में टीन की फिसलपट्टी होती है, उसी तरह से यह नदियां हिमलय से बर्फ की फिसलपट्टी से धड़ाधड़ नीचे उतारती हैं. हिमालय के इसी क्षेत्र में नेपाल के हिस्से में सबसे ऊंची चोटियां हैं और कम दूरी तय करके ये नदियां उत्तर भारत में नीचे उतरती हैं. इसलिए इन नदियों की पानी क्षमता, उनका वेग, उनके साथ कच्चे हिमालय से, शिवालिक से आने वाली मिट्टी और गाद इतनी अधिक होती है कि उसकी तुलना पश्चिमी हिमालय और उत्तर-पूर्वी हिमालय से नहीं कर सकते.

एक तो यह सबसे ऊंचा क्षेत्र है, कच्चा भी है, फिर भ्रंश पर टिका हुआ इलाका है. यहां भौगोलिक परिस्थितियां ऐसी हैं, जहां से हिमालय का जन्म हुआ है. बहुत कम लोगों को अंदाज होगा कि हमारा समाज भी भू-विज्ञान को, ‘जिओ मार्फालॉजी’ को खूब अच्छी तरह समझता है. इसी इलाके में ग्यारहवीं शताब्दी में बना वराह अवतार का मंदिर भी है जो किसी और इलाके में आसानी से मिलता नहीं है. यह हिस्सा कुछ करोड़ साल पहले किसी एक घटना के कारण हिमालय के रूप में सामने आया. यहीं से फिर नदियों का जाल बिछा. ये सरपट दौड़ती हुई आती हैं- सीधी उतरती हैं. इससे उनकी ताकत और बढ़ जाती है.

जब हिमालय बना तब कहते हैं कि उसके तीन पुड़े थे. तीन तहें थीं. जैसे मध्यप्रदेश के हिस्से में सतपुड़ा है वैसे यहां तीन पुड़े थे- आंतरिक, मध्य और वाह्य. वाह्य हिस्सा शिवालिक सबसे कमजोर माना जाता है. वैसे भी भूगोल की परिभाषा में हिमालय के लिए कहा जाता है कि यह अरावली, विंध्य और सतपुड़ा के मुकाबले बच्चा है. महीनों के बारह पन्ने पलटने से हमारे सभी तरह के कैलेंडर दीवार पर से उतर आते हैं. लेकिन प्रकृति के कैलेंडर में लाखों वर्षों का एक पन्ना होता है. उस कैलेंडर से देखें तो शायद अरावली की उम्र नब्बे वर्ष होगी और हिमालय, अभी चार-पांच बरस का शैतान बच्चा है. वह अभी उलछता-कूदता है, खेलता-डोलता है. टूट-फूट उसमें बहुत होती रहती है. अभी उसमें प्रौढ़ता या वयस्क वाला संयम, शांत, धीरज वाला गुण नहीं आया है. इसलिए हिमालय की ये नदियां सिर्फ पानी नहीं बहाती हैं वे साद, मिट्टी, पत्थर और बड़ी-बड़ी चट्टानें भी साथ लाती हैं. उत्तर बिहार का समाज अपनी स्मृति में इन बातों को दर्ज कर चुका था.

एक तो चंचल बच्चा हिमालय, फिर कच्चा और तिस पर भूकंप वाला क्षेत्र भी- क्या कसर बाकी है? हिमालय के इसी क्षेत्र से भूकंप की एक बड़ी और प्रमुख पट्टी गुजरती है. दूसरी पट्टी इस पट्टी से थोड़े ऊपर के भाग के मध्य हिमालय में आती है. सारा भाग लाखों बरस पहले के अस्थिर मलबे के ढेर से बना है और फिर भूकंप इसे जब चाहे और अस्थिर बना देते है. भू- विज्ञान बताता है कि इस उत्तर बिहार में और नेपाल के क्षेत्र में धरती में समुद्र की तरह लहरें उठी थीं और फिर वे एक-दूसरे से टकरा कर ऊपर ही ऊपर उठती चली गई और फिर कुछ समय के लिए स्थिर हो गई, यह ‘स्थिरता’ तांडव नृत्य की तरह है. आधुनिक विज्ञान की भाषा में लाखों वर्ष पहले ‘मियोसिन’ काल में घटी इस घटना को उत्तरी बिहार के समाज ने अपनी स्मृति में वराह अवतार के रूप में जमा किया है. जिस डूबती पृथ्वी को वराह ने अपने थूथनों से ऊपर उठाया था, वह आज भी कभी भी कांप जाती है. 1934 में जो भूकंप आया था, उसे अभी भी लोग भूले नहीं हैं.

लेकिन यहां के समाज ने इन सब परिस्थितियों को अपनी जीवन शैली में, जीवन दर्शन में धीरे-धीरे आत्मसात किया था. प्रकृति के इस विराट रूप में वह एक छोटी सी बूंद की तरह शामिल हुआ. उसमें कोई घमंड नहीं था. वह इस प्रकृति से खेल लेगा, लड़ लेगा. वह उसकी गोद में कैसे रह सकता है- इसका उसने अभ्यास करके रखा था. क्षणभंगुर समाज ने करोड़ वर्ष की इस लीला में अपने को प्रौढ़ बना लिया और फिर अपनी प्रौढ़ता को हिमालय के लड़कपन की गोद में डाल दिया था. लेकिन पिछले सौ- डेढ़ सौ साल में हमारे समाज ने ऐसी बहुत सारी चीजें की हैं जिनसे उसका विनम्र स्वभाव बदला है और उसके मन में थोड़ा घमंड भी आया है. समाज के मन में न सही तो उसके नेताओं, के योजनाकारों के मन में यह घमंड आया है.

समाज ने पीढ़ियों से, शताब्दियों से, यहां फिसलगुंडी की तरह फुर्ती से उतरने वाली नदियों के साथ जीवन जीने की कला सीखी थी, बाढ़ के साथ बढ़ने की कला सीखी थी. उसने और उसकी फसलों ने बाढ़ में डूबने के बदले तैरने की कला सीखी थी. वह कला आज धीरे-धीरे मिटती जा रही है. उत्तर बिहार में हिमालय से उतरने वाली नदियों की संख्या अनंत है. कोई गिनती नहीं है, फिर भी कुछ लोगों ने उनकी गिनती की है. आज लोग यह मानते हैं कि यहां पर इन नदियों ने दुख के अलावा कुछ नहीं दिया है. पर इनके नाम देखेंगे तो इनमें से किसी भी नदी के नाम में, विशेषण में दुख का कोई पर्यायवाची देखने को नहीं मिलेगा. लोगों ने नदियों को हमेशा देवियों के रूप में देखा है. लेकिन हम उनके विशेषण दूसरी तरह से देखें तो उनमें आपको बहुत तरह-तरह के ऐसे शब्द मिलेंगे जो उस समाज और नदियों के रिश्ते को बताते हैं. कुछ नाम संस्कृत से होंगे. कुछ गुणों पर होंगे और एकाध अवगुणों पर भी हो सकते हैं.

इन नदियों के विशेषणों में सबसे अधिक संख्या है- आभूषणों की. और ये आभूषण हंसुली, और चंद्रहार जैसे गहनों के नाम पर हैं. हम सभी जानते हैं कि ये आभूषण गोल आकार के होते हैं- यानी यहां पर नदियां उतरते समय इधर- उधर सीधी बहने के बदले आड़ी, तिरछी, गोल आकार में क्षेत्र को बांधती हैं- गांवों को लपेटती हैं और उन गांवों को आभूषणों की तरह श्रृंगार करती हैं. उत्तर बिहार के कई गांव इन ‘आभूषणों’ से ऐसे सजे हुए थे कि बिना पैर धोए आप इन गांवों में प्रवेश नहीं कर सकते थे. इनमें रहने वाले आपको गर्व से बताएंगे कि हमारे गांव की पवित्र धूल गांव से बाहर नहीं जा सकती, और आप अपनी (शायद अपवित्र) धूल गांव में ला नहीं सकते. कहीं- कहीं बहुत व्यावहारिक नाम भी मिलेंगे. एक नदी का नाम गोमूत्रिका है- जैसे कोई गाय चलते-चलते पेशाब करती है तो जमीन पर आड़े तिरछे निशान पड़ जाते हैं इतनी आड़ी तिरछी बहने वाली यह नदी है. इसमें एक-एक नदी का स्वभाव देखकर लोगों ने इसको अपनी स्मृति में रखा है.

एक तो इन नदियों का स्वभाव और ऊपर से पानी के साथ आने वाली साद के कारण ये अपना रास्ता बदलती रहती हैं. कोसी के बारे में कहा जाता है कि पिछले कुछ सौ साल में 148 किलोमीटर के क्षेत्र में अपनी धारा बदली है. उत्तर बिहार के दो जिलों की इंच भर जमीन भी कोसी ने नहीं छोड़ी है जहां से वह बही न हो. ऐसी नदियों को हम किसी तरह के तटबंध या बांध से बांध सकते हैं, यह कल्पना करना भी अपने आप में विचित्र है. समाज ने इन नदियों को अभिशाप की तरह नहीं देखा. उसने इनके वरदान को कृतज्ञता से देखा. उसने यह माना कि इन नदियों ने हिमालय की कीमती मिट्टी इस क्षेत्र के दलदल में पटक कर बहुत बड़ी मात्रा में खेती योग्य जमीन निकाली है. इसलिए वह इन नदियों को बहुत आदर के साथ देखता रहा है. कहा जाता है कि पूरा का पूरा दरभंगा खेती योग्य हो सका तो इन्हीं नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी के कारण ही. लेकिन इनमें भी समाज ने उन नदियों को छांटा है जो अपेक्षाकृत कम साद वाले इलाकों से आती हैं.

ऐसी नदियों में एक है- खिरोदी. कहा जाता है कि इसका नामकरण क्षीर अर्थात दूध से हुआ है, क्योंकि इसमें साफ पानी बहता है. एक नदी जीवछ है, जो शायद जीवात्मा या जीव इच्छा से बनी होगी. सोनबरसा भी है. इन नदियों के नामों में गुणों का वर्णन देखेंगे तो किसी में भी बाढ़ से लाचारी की झलक नहीं मिलेगी. कई जगह ललित्य है इन नदियों के स्वभाव में. सुंदर कहानी है मैथिली के कवि विद्यापति की. कवि जब अस्वस्थ हो गए तो उन्होंने अपने प्राण नदी में छोड़ने का प्रण किया. कवि प्राण छोड़ने नदी की तरफ चल पड़े, मगर बहुत अस्वस्थ होने के कारण नदी किनारे तक नहीं पहुंच सके. कुछ दूरी पर ही रह गए तो नदी से प्रार्थना की कि हे मां, मेरे साहित्य में कोई शक्ति हो, मेरे कुछ पुण्य हों तो मुझे ले जाओ. कहते हैं कि नदी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और कवि को बहा ले गई.

नदियां विहार करती हैं, उत्तर बिहार में. वे खेलती हैं, कूदती हैं. यह सारी जगह उनकी है. इसलिए वे कहीं भी जाएं उसे जगह बदलना नहीं माना जाता था. उत्तर बिहार में समाज का एक दर्पण साहित्य रहा होगा तो दूसरा तरल दर्पण नदियां थीं. इन असंख्य नदियों में वहां का समाज अपना चेहरा देखता था और नदियों के चंचल स्वभाव को बड़े शांत भाव से देह में, अपने मन और अपने विचारों में उतारता था. इसलिए कभी वहां कवि विद्यापति जैसे सुंदर किस्से बनते तो कभी फुलपरास जैसी घटनाएं रेत में उकेरी जातीं. नदियों की लहरें रेत में लिखी इन घटनाओं को मिटाती नहीं थीं- हर लहर इन्हें पक्के शिलालेखों में बदलती थी. ये शिलालेख इतिहास में मिलें न मिलें, लोगों के मन में, लोक स्मृति में मिलते थे. फुलपरास का किस्सा यहां दोहराने लायक है.

कभी भुतही नदी फुलपरास नाम के एक स्थान से रास्ता बदलकर कहीं और भटक गई. तब भुतही को वापस बुलाने के लिए अनुष्ठान किया गया. नदी ने मनुहार स्वीकार की और अगले वर्ष वापस चली आई ! ये कहानियां समाज इसलिए याद रखवाना चाहता है कि लोगों को मालूम रहे कि यहां की नदियां कवि के कहने से भी रास्ता बदल लेती हैं और साधारण लोगों का आग्रह स्वीकार कर अपना बदला हुआ रास्ता फिर से सुधार लेती हैं. इसलिए इन नदियों के स्वभाव को ध्यान में रखकर जीवन चलाओ. ये चीजें हम लोगों को इस तरफ ले जाती हैं कि जिन बातों को भूल गए हैं उन्हें फिर से याद करें.

कुछ नदियों के बहुत विचित्र नाम भी समाज ने हजारों साल के अनुभव से रखे थे. इनमें से एक विचित्र नाम है- अमरबेल. कहीं से आकाशबेल भी कहते हैं. इस नदी का उद्भव और संगम कहीं नहीं दिखाई देता है. कहां से निकलती है, किस नदी में मिलती है- ऐसी कोई पक्की जानकारी नहीं है. बरसात के दिनों में अचानक प्रकट होती है और जैसे पेड़ पर अमरबेल छा जाती है वैसे ही एक बड़े इलाके में इसकी कई धाराएं दिखाई देती हैं. फिर ये गायब भी हो जाती हैं. यह भी जरूरी नहीं कि वह अगले साल इन्हीं धाराओं में से बहे. तब यह अपना कोई दूसरा नया जाल खोल लेती है. एक नदी का नाम है दस्यु नदी. यह दस्यु की तरह दूसरी नदियों की ‘कमाई’ हुई जलराशि का, उनके वैभव का हरण कर लेती है. इसलिए पुराने साहित्य में इसका एक विशेषण वैभवहरण भी मिलता है.

फिर बिल्कुल चालू बोलियों में भी नदियों के नाम मिलते हैं. एक नदी का नाम मरने है. इसी तरह एक नदी मरगंगा है. भुतहा या भुतही का किस्सा तो ऊपर आ ही गया है. जहां ढेर सारी नदिया हर कभी हर कहीं से बहती हों सारे नियम तोड़ कर, वहां समाज ने एक ऐसी भी नदी खोज ली थी जो टस से मस नहीं होती थी. उसका नाम रखा गया- धर्ममूला. ऐसे भूगोलविद समझदार समाज के आज टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं. ये सब बताते हैं कि नदियां यहां जीवंत भी हैं और कभी- कभी वे गायब भी हो जाती हैं, भूत भी बन जाती हैं, मर भी जाती हैं. यह सब इसलिए होता है कि ऊपर से आने वाली साद उनमें -भरान और धसान- ये दो गतिविधियां इतनी तेजी से चलाती हैं कि उनके रूप हर बार बदलते जाते हैं.

बहुत छोटी-छोटी नदियों के वर्णन में ऐसा मिलता है कि इनमें ऐसे भंवर उठते हैं कि हाथियों को भी डुबो दे. इनमें चट्टानें और पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े आते हैं और जब वे आपस में टकराते हैं तो ऐसी आवाज आती है कि दिशाएं बहरी हो जाएं! ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि कुछ नदियों में बरसात के दिनों में मगरमच्छों का आना इतना अधिक हो जाता है कि उनके सिर या थूथने गोबर के कंडे की तरह तैरते हुए दिखाई देते हैं. ये नदियां एक-दूसरे से बहुत मिलती हैं, एक-दूसरे का पानी लेती हैं और देती भी हैं. इस आदान-प्रदान में जो खेल होता है उसे हमने एक हद तक अब बाढ़ में बदल दिया है. नहीं तो यहां के लोग इस खेल को दूसरे ढंग से देखते थे. वे बाढ़ की प्रतीक्षा करते थे.

इन्हीं नदियों की बाढ़ के पानी को रोक कर समाज बड़े-बड़े तालाबों में डालता था और इससे इनकी बाढ़ का वेग कम करता था. एक पुराना पद मिलता है- ‘चार कोसी झाड़ी.’ इसके बारे में नए लोगों को अब ज्यादा कुछ पता नहीं है. पुराने लोगों से ऐसी जानकारी एकत्र कर यहां के इलाकों का स्वभाव समझना चाहिए. चार कोसी झाड़ी का कुछ हिस्सा शायद चम्पारण में बचा है. ऐसा कहते हैं कि पूरे हिमालय की तराई में चार कोस की चौड़ाई का एक घना जंगल बचा कर रखा गया था. इसकी लंबाई पूरे बिहार में ग्यारह- बारह सौ किलोमीटर तक चलती थी. यह पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र तक जाता था. चार कोस चौड़ाई और उसकी लंबाई हिमालय की पूरी तलहटी में थी. आज के खर्चीले, अव्यावहारिक तटबंधों के बदले यह विशाल वन-बंध बाढ़ में आने वाली नदियों को छानने का काम करता था. तब भी बाढ़ आती रही होगी, लेकिन उसकी मारक क्षमता ऐसी नहीं होगी.

ढाइ हजार साल पहले एक संवाद में बाढ़ का कुछ वर्णन मिलता है. संवाद भगवान बुद्ध और एक ग्वाले के बीच है. ग्वाले के घर में किसी दिन भगवान बुद्ध पहुंचे हैं. काली घटाएं छाई हुई हैं. ग्वाला बुद्ध से कह रहा है कि उसने अपना छप्पर कस लिया है, गाय को मजबूती से खूंटे में बांध दिया है, फसल काट ली है. अब बाढ़ का कोई डर नहीं बचा है. आराम से चाहे जितना पानी बरसे. नदी देवी दर्शन देकर चली जाएंगी. इसके बाद भगवान बुद्ध ग्वाले से कह रहे हैं कि मैंने तृष्णा की नावों को खोल दिया है. अब मुझे बाढ़ का कोई डर नहीं है. युगपुरुष साधारण ग्वाले की झोपड़ी में नदी किनारे रात बिताएंगे. उस नदी के किनारे, जिसमें रात को कभी भी बाढ़ आ जाएगी? पर दोनों निश्चिंत हैं. आज क्या ऐसा संवाद बाढ़ से ठीक पहले हो पाएगा?

ये सारी चीजें बताती हैं कि लोग इस पानी से, इस बाढ़ से खेलना जानते थे. यहां का समाज इस बाढ़ में तैरना जानता था. इस बाढ़ में तरना भी जानता है. इस पूरे इलाके में ह्रद और चौरा या चौर दो शब्द बड़े तालाबों के लिए हैं. इस इलाके में पुराने और बड़े तालाबों का वर्णन खूब मिलता है. दरभंगा का एक तालाब इतना बड़ा था कि उसका वर्णन करने वाले उसे अतिशयोक्ति तक ले गए. उसे बनाने वाले लोगों ने अगस्त्य मुनि तक को चुनौती दी कि तुमने समुद्र का पानी पीकर उसे सुखा दिया था, अब हमारे इस तालाब का पानी पीकर सुखा दो तब जानें. वैसे समुद्र जितना बड़ा कुछ भी न होगा- यह वहां के लोगों को भी पता था. पर यह खेल है कि हम इतना बड़ा तालाब बनाना जानते हैं.

उन्नीसवीं शताब्दी तक वहां के बड़े-बड़े तालाबों के बड़े-बड़े किस्से चलते थे. चौर में भी बाढ़ का अतिरिक्त पानी रोक लिया जाता था. परिहारपुर, भरवारा और आलापुर आदि क्षेत्रों में दो-तीन मील लंबे-चौड़े तालाब थे. धीरे-धीरे बाद के नियोजकों के मन में यह आया कि इतनी जलराशि से भरे बड़े-बड़े तालाब बेकार की जगह घेरते हैं- इनका पानी सुखाकर जमीन लोगों को खेती के लिए उपलब्ध करा दें. इस तरह हमने दो-चार खेत जरूर बढ़ा लिए, लेकिन दूसरी तरफ शायद सौ-दो-सौ खेत हमने बाढ़ को भेंट चढ़ा दिए. ये बड़े-बड़े तालाब वहां बाढ़ का पानी रोकने का काम करते थे.

आज अंग्रेजी में रेन वॉटर हारवेस्टिंग शब्द है. इस तरह का पूरा ढांचा उत्तर बिहार के लोगों ने बनाया था. वह ‘फ्लड वॉटर हारवेस्टिंग सिस्टम’ था. उसी से उन्होंने यह खेल खेला था. तब भी बाढ़ आती थी, लेकिन वे बाढ़ की मार को कम से कम करना जानते थे. तालाब का एक विशेषण यहां मिलता है- नदिया ताल. मतलब है- वह वर्षा के पानी से नहीं, बल्कि नदी के पानी से भरता था. पूरे देश में वर्षा के पानी से भरने वाले तालाब मिलेंगे. लेकिन यहां हिमालय से उतरने वाला तालाब बनाना ज्यादा व्यावहारिक होता था. नदी का पानी धीरे-धीरे कहीं न कहीं रोकते-रोकते उसकी मारक क्षमता को उपकार में बदलते-बदलते आगे गंगा में मिलाया जाता था.

आज के नए लोग मानते हैं कि समाज अनपढ़ है, पिछड़ा है. नए लोग ऐसे दंभी हैं. उत्तर बिहार से निकलने वाली बाढ़ पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में जाती है. एक मोटा अंदाजा है कि बांग्लादेश में कुल जो जलराशि इकट्ठा होती है, उसका केवल दस प्रतिशत उसे बादलों से मिलता है. नब्बे फीसदी उसे बिहार, नेपाल और दूसरी तरफ से आने वाली नदियों से मिलता है. वहां तीन बड़ी नदियां गंगा, मेघना और ब्रह्मपुत्र हैं. ये तीनों नदियां नब्बे फीसदी पानी उस देश में लेकर आती हैं और कुल दस फीसदी वर्षा से मिलता है. बांग्लादेश का समाज सदियों से इन नदियों के किनारे इनके संगम के किनारे रहना जानता था. वहां नदी अनेक मीलों फैल जाती है. हमारी जैसी नदियां नहीं होतीं कि एक तट से दूसरा तट दिखाई दे. वहां की नदियां क्षितिज तक चली जाती हैं. उन नदियों के किनारे भी वह न सिर्फ बाढ़ से खेलना जानता था, बल्कि उसे अपने लिए उपकारी भी बनाना जानता था. इसी में से अपनी अच्छी फसल निकालता था, आगे का जीवन चलाता था और इसीलिए सोनार बांग्ला कहलाता था.

लेकिन धीरे- धीरे चार कोसी झाड़ी गई. ह्रद और चौर चले गए. कम हिस्से में अच्छी खेती करते थे, उसको लालच में थोड़े बड़े हिस्से में फैलाकर देखने की कोशिश की. और हम अब बाढ़ में डूब जाते हैं. बस्तियां कहां बनेंगी, कहां नहीं बनेंगी इसके लिए बहुत अनुशासन होता था. चौर के क्षेत्र में केवल खेती होगी, बस्ती नहीं बसेगी- ऐसे नियम टूट चुके हैं तो फिर बाढ़ भी नियम तोड़ने लगी है. उसे भी धीरे-धीरे भूलकर चाहे आबादी का दबाव कहिए या अन्य अनियंत्रित विकास के कारण- अब हम नदियों के बाढ़ के रास्ते में सामान रखने लगे हैं, अपने घर बनाने लगे हैं. इसलिए नदियों का दोष नहीं है. अगर हमारी पहली मंजिल तक पानी भरता है तो इसका एक बड़ा कारण उसके रास्ते में विकास करना है.

एक और बहुत बड़ी चीज पिछले दो-एक सौ साल में हुई है. वे हैं तटबंध और बांध. छोटे से लेकर बड़े बांध इस इलाके में बनाए गए हैं, बगैर इन नदियों का स्वभाव समझे. नदियों की धारा इधर से उधर न भटके यह मानकर हमने एक नए भटकाव के विकास की योजना अपनाई है. उसको तटबंध कहते हैं. ये बांग्लादेश में भी बने हैं और इनकी लंबाई सैकड़ों मील तक जाती है. और उसके बाद आज पता चलता है कि इनसे बाढ़ रुकने के बजाय बढ़ी है, नुकसान ही ज्यादा हुआ है. अभी तो कहीं-कहीं ये एकमात्र उपकार यह करते हैं कि एक बड़े इलाके की आबादी जब डूब से प्रभावित होती है, बाढ़ से प्रभावित होती है तो लोग इन तटबंधों पर ही शरण लेने आ जाते हैं. जो बाढ़ से बचाने वाली योजना थी वह केवल शरणस्थली में बदल गई है. इन सब चीजों के बारे में सोचना चाहिए. बहुत पहले से लोग कह रहे हैं कि तटबंध व्यावहारिक नहीं हैं. लेकिन हमने देखा है कि पिछले डेढ़ सौ साल में हम लोगों ने तटबंधों के सिवाय और किसी चीज में पैसा नहीं लगाया है, ध्यान नहीं लगाया है.

बाढ़ अगले साल भी आएगी. यह अतिथि नहीं है. इसकी तिथियां तय हैं और हमारा समाज इससे खेलना जानता था. लेकिन अब हम जैसे- जैसे ज्यादा विकसित होते जा रहे हैं, इसकी तिथियां और इसका स्वभाव भूल रहे हैं. इस साल कहा जाता है कि बाढ़ राहत में खाना बांटने में, खाने के पैकेट गिराने में हेलीकाप्टर का जो इस्तेमाल किया गया, उसमें चौबीस करोड़ रुपए का खर्च आया था. शायद इस लागत से सिर्फ दो करोड़ की रोटी- सब्जी बांटी गई थी. ज्यादा अच्छा होता कि इस इलाके में चौबीस करोड़ के हेलीकाप्टर के बदले हम कम से कम बीस हजार नावें तैयार रखते और मछुआरे, नाविकों, मल्लाहों को सम्मान के साथ इस काम में लगाते. यह नदियों की गोदी में पला-बढ़ा समाज है. इसे बाढ़ भयानक नहीं दिखती. अपने घर की, परिवार की सदस्य की तरह दिखती है- उसके हाथ में हमने बीस हजार नावें छोडी होतीं. इस साल नहीं छोड़ी गईं तो अगले साल इस तरह की योजना बन सकती है. नावें तैयार रखी जाएं- उनके नाविक तैयार हों, उनका रजिस्टर तैयार हो, जो वहां के जिलाधिकारी या इलाके की किसी प्रमुख संस्था या संगठन के पास हो, उसमें किसी राहत की सामग्री कहां- कहां से रखी जाएगी, यह सब तय हो. और हरेक नाव को निश्चित गांवों की संख्या दी जाए. डूब के प्रभाव को देखते हुए, पुराने अनुभव को देखते हुए, उनको सबसे पहले कहां- कहां अनाज या बना-बनाया खाना पहुंचाना है- इसकी तैयारी हो. तब हम पाएंगे कि चौबीस करोड़ के हेलीकाप्टर के बदले शायद यह काम एक या दो करोड़ में कर सकेंगे और इस राशि की एक-एक पाई उन लोगों तक जाएगी जिन तक बाढ़ के दिनों में उसे जाना चाहिए.

बाढ़ आज से नहीं आ रही है. अगर आप बहुत पहले का साहित्य न भी देखें तो देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू की आत्मकथा में देखेंगे कि उसमें छपरा की भयानक बाढ़ का उल्लेख मिलेगा. उस समय कहा जाता है कि एक ही घंटे में छत्तीस इंच वर्षा हुई थी और पूरा छपरा जिला पानी में डूब गया था. तब भी राहत का काम हुआ और तब पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सरकार से आगे बढ़कर काम किया था. उस समय भी आरोप लगे थे कि प्रशासन ने इसमें कोई खास मदद नहीं दी. आज भी ऐसे आरोप लगते हैं, ऐसी ही बाढ़ आती है. तो चित्र बदलेगा नहीं. बड़े नेताओं की आत्मकथाओं में इसी तरह की लाइनें लिखी जाएंगी और अखबारों में भी इसी तरह की चीजें छपेंगी. लेकिन हमें कुछ विशेष करके दिखाना है तो हम लोगों को नेपाल, बिहार, बंगाल और बांग्लादेश- सभी को मिलकर बात करनी होगी. पुरानी स्मृतियों में बाढ़ से निपटने के क्या तरीके थे, उनका फिर से आदान-प्रदान करना होगा. उन्हें समझना होगा और उन्हें नई व्यवस्था में हम किस तरह से ज्यों का त्यों या कुछ सुधार कर अपना सकते हैं, इस पर ध्यान देना होगा.

जब शुरू- शुरू में अंग्रेजों ने इस इलाके में नहरों का, पानी का काम किया, तटबंधों का काम किया तब भी उनके बीच में एक-दो ऐसे सहृदय समझदार और यहां की मिट्टी को जानने- समझने वाले अधिकारी रहे जिन्होंने ऐसा माना था कि जो कुछ किया गया है उससे यह इलाका सुधरने के बदले और अधिक बिगड़ा है. इस तरह की चीजें हमारे पुराने दस्तावेजों में हैं. इन सबको एक साथ समझना-बूझना चाहिए और इसमें से फिर कोई रास्ता निकालना चाहिए. नहीं तो उत्तर बिहार की बाढ़ का प्रश्न ज्यों का त्यों बना रहेगा. हम उसका उत्तर नहीं खोज पाएंगे.

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